बहुत सी जातक कथाएँ, लोक कथाएँ पढ़ी हैं, मगर उससे जयादा सुनी हैं ( बाबु जी से ) ! बाबु जी के पास जीवन की हर छोटी बड़ी घटनाओ को लेकर एक न एक कहानी जुबानी रहती है ! हर बात के पीछे " वो कहानी है ना " जोड़ देना उनके लिए सहज है ! आज शाम को ऑफिस से घर आया तो घरवालों के याद दिलाने पर याद आया कि मैं माँ की दवाई लाना भूल गया हूँ ! इससे पहले सभी दुकान बंद हो जाती मैं नुक्कड़ पर केमिस्ट की दुकान से दवाई ले आया ! रात को खाना खाते वक़्त बाबु जी ने कहा ..."आज तुम दवाई लाना भूल गए हो, और कभी भी अपनी मर्ज़ी से कुछ भी खरीद कर नहीं लाते हो घर मैं, कल से रोज़ कुछ न कुछ लाना होगा वरना घर के अंदर आने की मनाही होगी !" मैंने कहा... " ये क्या बात हुई, कुछ न कुछ से क्या मतलब है ? "
बाबु जी बोले... " कुछ न कुछ से मतलब है कुछ भी जैसे फल, सब्जी, मिठाई, कपडे, लकड़ी, पत्थर,मिटटी कुछ भी"
मैं मन ही मन हँसा मगर चेहरे पर गंभीरता बनी रही ! मैंने कहा...
" ये सब समझा मगर पत्थर, लकड़ी, इन सब चीजों का क्या फायदा, इन सब का क्या होगा ?"
मेरे मन में उठ रहे सवाल को ख़तम करने के लिए बाबु जी ने एक कहानी सुनानी शुरू की..
एक राज्य में गरीब ब्राह्मन अपनी धर्म पत्नी के साथ रहता था ! दूसरों के घर में पूजा अनुष्टान करने पर जो धन प्राप्त होता उससे उनका गुजर बसर हो जाता था ! कभी कभी दान में अनाज और फल भी मिल जाया करता था ! मगर कुछ दिनों से ब्राह्मण को न ही पूजा अनुष्टान के लिए कोई आमंत्रित करता और उसे कोई दान भी नहीं मिल रहा था ! ब्राह्मण शाम को रोज़ खाली हाँथ घर आने लगा ! एक दिन ब्राह्मण की पत्नी बोली आप रोज़ खाली हाँथ घर आ जाते हो इस तरह गुजर कैसे होगा, कल से आप रोज़ कुछ न कुछ लेकर ही आना मगर खाली हाँथ मत आना ! ब्राह्मण सोंचने लगा की आज कल कोई पूजा अनुष्टान तो करवा नहीं रहा, दान भी मुश्किल से कभी कभी मिलता है, अब ऐसे में रोज़ क्या लेकर आऊं, ! अगले दिन सुबह सुबह ही ब्राह्मण घर से निकल गया कि शायद आज कुछ धन का इंतजाम हो जायेगा मगर शाम तक ब्राह्मण ने न ही कुछ धन कमाए और न ही कहीं से कोई दान मिला ! वापस आते समय उसे अपनी पत्नी की बात याद आई कि उसने कहा है की कुछ न कुछ जरूर लाना है ! ब्राह्मण सोंचने लगा की अब घर क्या लेकर जाऊं ! जंगल से घर की तरफ जाते समय ब्राह्मण को ख्याल आया की क्यों न आज जंगल से लकड़ियाँ ही उठा लूं ! ब्राह्मण जंगल में से पेढ की टूटी लकड़ियाँ उठाने लगा और उन्हें जमा करके घर ले आया ! घर आकर पत्नी से कहा की तुमने कहा था कुछ न कुछ जरूर लाना तो आज मैं ये लकड़ियाँ लाया हूँ ! पत्नी ने उन लकड़ियों के गट्ठर को आँगन में रख दिया ! अगले दिन ब्राह्मण की पत्नी उन लकड़ियों के गट्ठर को बेच कर जो धन प्राप्त हुआ उससे अनाज खरीद लाइ ! कई दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा, जब भी ब्राह्मण को किसी दिन धन या दान नहीं मिलता वो जंगल से लकड़ियाँ उठा लाता ! एक रोज़ ब्राह्मण को न ही धन मिला, न ही दान और न ही वन में गिरी हुई लकड़ियाँ ! ब्राह्मण ये सोंच कर बहुत दुखी हुआ की आज घर क्या लेकर जाऊंगा, आज तो वन मैं सूखी लकड़ियाँ भी नहीं है ! तभी जंगल में उसने एक मरा हुआ सांप देखा ! ब्राह्मण उसे उठाकर घर की तरफ चल दिया ये सोंचता हुआ की आज हो न हो उसकी पत्नी उस पर जरूर नाराज़ होगी ! घर पहुच कर उसने अपनी पत्नी से कहा की आज सिर्फ ये मरा हुआ सांप मिला है, इसे हीं लेकर आया हूँ ! ये सुनकर ब्राह्मण की पत्नी बोली कोई बात नहीं कुछ तो लेकर आये हो न, इसे बहार आँगन में रख दो ! अगले दिन सुबह ब्राह्मण धन कमाने के लिए रोज़ की तरह घर से निकल गया ! राजमहल में महारानी ने नित्य स्नान के लिए अपने आभूषण उतार कर जैसे ही रखे, एक चील कहीं से उड़ता हुआ आया और उन आभूषण में से बेश कीमती हार अपनी चोंच में दबाकर ले उड़ा ! उड़ता हुआ चील जब ब्राह्मण के घर के ऊपर से जा रहा था तो उसकी नज़र मरे हुए सांप पर पड़ी ! चील अपना भोजन देख नीचे उतरा और उस हार को वहीँ छोड़ मरे हुए सांप को अपनी चोंच में दबा कर ले उड़ा ! उधर महारानी का हार खो जाने पर राजा ने हर और मुनादी करवा दी कि जो भी कोई महारानी का हार ढूँढ कर लायेगा उसे उच्च पुरूस्कार से सम्मानित किया जायेगा ! ये खबर सुनकर ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ गया और उसने वो हार राजा को सौप दिया ! राजा ने ब्राह्मण को धन से पुरुस्कृत किया और उसकी इमानदारी को देख कर अपनी राज्य का राज पुरोहित बना दिया !
मैं बाबु जी से कहानी सुनकर बहुत खुश हुआ ! जिस भी कहानी का अंत सुखद हो मन को बहुत ख़ुशी मिलती है ! फिर भी मैंने मन ही मन सोंचा की अब वो जमाना है कहाँ, जब सच्चाई और इमानदारी पर पुरस्कार मिलते थे ! आज कोई इसकी सराहना ही कर दे वही बहुत होता है ! मगर सच और इमानदारी के राह पर चलने वालों को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि कोई उसकी इमानदारी या सच्चाई कि कद्र करता है या नहीं, वो तो बस सच्चाई और इमानदारी को ही अपना जीवन मान कर चलते रहते हैं !
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शुक्रवार, 17 सितंबर 2010
गुरुवार, 26 अगस्त 2010
विवशता
४ जुलाई २००१
दिल्ली की तरफ वापसी का सफ़र शुरू हुआ ! कितनी ही आशाओ तथा अभिलाषाओं को संचित कर पुरे उल्लास से समय के व्यतीत होने का इंतजार कर रहा हूँ ! कल रात दिल्ली पहुच पाऊँगा, बड़ी विवशता से भरे हैं ये शब्द !
स्टेशन पर रहने वालो की जिंदगी कितनी संकीर्ण है, पग पग पर बेबसी तथा लाचारी मुह खोले अजगर के समान मिलती है ! पल भर गाड़ी बरौनी स्टेशन पर रुकी, मैं खिड़की में से चलायमान चिरजीवियों को देख रहा था शायद कुछ सोंच रहा था ! रह-रह कर चाय और पूरी के शब्दों की गर्जना कानो में पड़ती थी, तभी एक आवाज़ ने मेरी तन्द्रा भंग की
"बाबु जी ज़रा पैर हटाइये"
मैंने पैर ऊपर कर लिया वह झाड़ू लगता आगे निकल पड़ा अभी उसकी शक्ल पूरी तरह धुंधली भी नहीं हुई थी की वह वापस मेरे सामने हाँथ फैलाये खड़ा था इस इंतज़ार में की उसकी भूख को कुछ पल के लिए दबाया जा सके, जो पैसे मिलते उसे वह अपने परिवार पर खर्च करता ! इस वक़्त वह अकेला नहीं था उसका लगभग सात या आठ वर्ष का लड़का झाड़ू के भार को सहता अमुक मेरी तरफ देख रहा था, अन्यथा ही मैं उसके भार को महसूस कर रहा था ! मैंने जेब टटोला पाँच का नोट निकलते हुए मैंने उस लड़के की तरफ बढाया, उस व्यक्ति ने लड़के से कहा...
"जा ले ले बाबूजी ख़ुशी ख़ुशी दे रहें हैं "
पर लड़का न जाने किस संकोच से पिता की आढ में खड़ा हो गया, शायद उसका अहं यह मंज़ूर नहीं कर रहा था ! वह व्यक्ति नोट लेकर चला गया ! मैं वापस खिड़की में झाकने लगा ! दूर सीढियों के किनारे कुछ मैले कपडे का ढेर पड़ा था ! कुछ मैले से बर्तन थे, और फटा पुराना तकिया बड़ी सावधानी से लगा रखा था ! वही व्यक्ति वहां जाकर लेट गया उसकी पत्नी उसे पंखा झेलने लगी उसका लड़का वहीं उसी के साथ आढ लेकर सो गया ! उस व्यक्ति ने अपनी पत्नी को क्या जिंदगी दी की जिसके बाद पत्नी ने इतना त्याग किया इतनी सेवा की उसकी ! क्या उसके भाग्य में केवल स्टेशन से मिले भीख पर गुज़ारा करना बदा था ! वह चाहती तो इन सब को छोड़ कहीं उससे बेहतर जिंदगी गुज़ार सकती थी उसके पति ने उसे ऐसा क्या दिया था जिसके कारण उसने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया ! क्या कोई मोह इतना सब करवा सकता है या फिर किसी मज़बूरी में इंसान इतना बेबस हो जाता है की उसे कोई और राह सूझती नहीं !
मेरी गाड़ी चल पड़ी ! में अभी भी अँधेरे में आँखे फाड़े उनकी तरफ देखने की कोशिस कर रहा हूँ ! दोनों सो रहे हैं और वो औरत जिसे उसके पति ने तंगहाली में जिंदगी गुज़ारने का जरिया दिया वह अभी भी उसे पंखा झेल रही है !
दिल्ली की तरफ वापसी का सफ़र शुरू हुआ ! कितनी ही आशाओ तथा अभिलाषाओं को संचित कर पुरे उल्लास से समय के व्यतीत होने का इंतजार कर रहा हूँ ! कल रात दिल्ली पहुच पाऊँगा, बड़ी विवशता से भरे हैं ये शब्द !
स्टेशन पर रहने वालो की जिंदगी कितनी संकीर्ण है, पग पग पर बेबसी तथा लाचारी मुह खोले अजगर के समान मिलती है ! पल भर गाड़ी बरौनी स्टेशन पर रुकी, मैं खिड़की में से चलायमान चिरजीवियों को देख रहा था शायद कुछ सोंच रहा था ! रह-रह कर चाय और पूरी के शब्दों की गर्जना कानो में पड़ती थी, तभी एक आवाज़ ने मेरी तन्द्रा भंग की
"बाबु जी ज़रा पैर हटाइये"मैंने मुड कर देखा तो एकाएक घृणा के भाव से पल भर को होकर गुजर गया ! एक बूढ़ा सा दिखने वाला ईन्सान जिसके पेट के ऊपर के हिस्से में हड्डियों का कंकाल बना था, पेट लगभग भीतर की और सटका पड़ा था, चेहरे पर गरीबी से तंग पड़ गई झूर्रियाँ आ गई थी, मांस तो सिर्फ हड्डियों को ढकने के लिए था, दोनों कंधे आपस में जुड़े जा रहे थे, मैली सी धोती पहने, हाँथ में झाड़ू लिए डिब्बा साफ़ करता बोला...
"बाबु जी ज़रा पैर हटाइये"
मैंने पैर ऊपर कर लिया वह झाड़ू लगता आगे निकल पड़ा अभी उसकी शक्ल पूरी तरह धुंधली भी नहीं हुई थी की वह वापस मेरे सामने हाँथ फैलाये खड़ा था इस इंतज़ार में की उसकी भूख को कुछ पल के लिए दबाया जा सके, जो पैसे मिलते उसे वह अपने परिवार पर खर्च करता ! इस वक़्त वह अकेला नहीं था उसका लगभग सात या आठ वर्ष का लड़का झाड़ू के भार को सहता अमुक मेरी तरफ देख रहा था, अन्यथा ही मैं उसके भार को महसूस कर रहा था ! मैंने जेब टटोला पाँच का नोट निकलते हुए मैंने उस लड़के की तरफ बढाया, उस व्यक्ति ने लड़के से कहा...
"जा ले ले बाबूजी ख़ुशी ख़ुशी दे रहें हैं "
पर लड़का न जाने किस संकोच से पिता की आढ में खड़ा हो गया, शायद उसका अहं यह मंज़ूर नहीं कर रहा था ! वह व्यक्ति नोट लेकर चला गया ! मैं वापस खिड़की में झाकने लगा ! दूर सीढियों के किनारे कुछ मैले कपडे का ढेर पड़ा था ! कुछ मैले से बर्तन थे, और फटा पुराना तकिया बड़ी सावधानी से लगा रखा था ! वही व्यक्ति वहां जाकर लेट गया उसकी पत्नी उसे पंखा झेलने लगी उसका लड़का वहीं उसी के साथ आढ लेकर सो गया ! उस व्यक्ति ने अपनी पत्नी को क्या जिंदगी दी की जिसके बाद पत्नी ने इतना त्याग किया इतनी सेवा की उसकी ! क्या उसके भाग्य में केवल स्टेशन से मिले भीख पर गुज़ारा करना बदा था ! वह चाहती तो इन सब को छोड़ कहीं उससे बेहतर जिंदगी गुज़ार सकती थी उसके पति ने उसे ऐसा क्या दिया था जिसके कारण उसने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया ! क्या कोई मोह इतना सब करवा सकता है या फिर किसी मज़बूरी में इंसान इतना बेबस हो जाता है की उसे कोई और राह सूझती नहीं !
मेरी गाड़ी चल पड़ी ! में अभी भी अँधेरे में आँखे फाड़े उनकी तरफ देखने की कोशिस कर रहा हूँ ! दोनों सो रहे हैं और वो औरत जिसे उसके पति ने तंगहाली में जिंदगी गुज़ारने का जरिया दिया वह अभी भी उसे पंखा झेल रही है !
सोमवार, 2 अगस्त 2010
रेल यात्रा
हाल हीं की बात है (27 अप्रैल 1996), वो तारीख़ मेरे पैन्ट की जेब मे सुरक्षित पडी है। मैं हैद्राबाद से दिल्ली लौट रहा था।
जाते समय पिताजी ने किसी तरह धक्कम-धक्का कर के स्थान दिला दिया था, पर आते समय मेरी मदत को कोई आगे नहीं बढा। परेशानी ये थी कि जल्दबाज़ी में निज़ामूद्दीन एक्सपेस की टिकट मिली। किसी तरह से हम सवार हो हीं गये, सीट भी मिल गई थी, पर बाल-गोपालों ने उस पर भी कब्ज़ा कर लिया। पहले नाशता मिला फिर रात्रि भोजन के लिऐ पूछा गया कि हम शाकाहारी हैं अथवा मांसाहारी। खातीरदारी मे कुछ कमी नहीं थी, ये बात और थी कि रोटीयाँ थोडी जली और दाल में थोडा नमक अधिक था।
सूरज डूब चुका था, रात्रि का आगमन बडे जोरों से था। ज्यों-ज्यों रात जवान होती जा रही थी नर-नारी, बाल-बालाऐं, व्रद्ध-युवक अपने-अपने मुद्राओं में संकलित हो चुके थे, इन मुद्राओं को देख अजंता-एलोरा की मुद्रित मुर्तीयो का स्मरण हो उठता था। कोई तिरछी मुद्रा मे तो कोई द्रविण प्राणायाम कोइ पद्धमासन की मुद्रा मे था,तो कोई उलट पुलट आसन कर रहा था। हम पर निंद्रादेवी क्रपा नहीं कर रहीं थी। धन्यवाद है विभिन्न प्रकार के रागबद्ध खर्राटे लेने वालो तथा वालीयों का जो निःशुल्क मनोरंजन प्रदान कर रहे थे। किसी कोने से शेर के गुर्राहट की आवाज़ आ रही थी तो कहीं गुंजित भ्रमरों की। कोई राग मलहार मे व्यस्त था तो कोई राग व्रष्टि गर्जन छेड रहा था। संगीत प्रेमियों के लिऐ मनोहारी द्रष्य था। मैं भी अपने शरीर को तोडता हूँ, मोडता हूँ कल्पना करता हूँ कि मैं अपने खाट पर हीं सो रहा हूँ- किन्तु निंद्रादेवी तो अप्रसन्न हीं रही। पैर समान के बोझ सहने का अब तक आदी हो चुका था। बाथरुम जाने के लिऐ उठा तो देखा कि ऐक खाते पीते घर की महिला जो भगवान की क्रपा से शरीर से भी तनदुरुस्त थी नीचे रास्ते पर निशिचन्तता से गहरी नींद का आनन्द ले रही थी। उसके वजन का आभाष उसके शरीर को देख कर हीं हो पडता था। पिछे देखा तो बाल गोपाल की भीड फर्श पर ठाट से सो रही थी।
"अवश्यकता हीं अविष्कार की जननी है"लोगों को किनारे से आता जाता देख मैने भी साहस कर ही लिया। इस भरी मगरमच्छो के तलाब को पार करता कि ऐक महाशय का समान मेरे उपर आ गिरा और मुझ पर से उस सोई हुई महिला पर। मुझे तो ख़ास चोट नही लगी पर नींद का आनन्द लेती सम्भ्रान्त महिला का सर घूम गया। उसने आव देखा न ताव लगी चिल्लाने
"मार डाला रे सर फोड दिया कम्बख्त ने"इक्कठी फौज देख मेरे तो रोंगटे खडे हो गये, भला क्यों न होते उस महिला के रिस्तेदार कोई दारा सिंह तो कोई यूकोजुना तो कोई महाबली ख़ली था और मैं अकेला असहाय। किसी तरह से मामला रफा दफा होने पर जान में जान आई। ऍसा लगा जैसे मैने कोई किला फतह कर लिया हो। मै अपनी जगह पर जा बैठा और कुछ देर के बाद सूर्य देव प्रकट होते है। सूर्य किरण झरोख़े से प्रवेश करती हैं। सब लोग अपने सहज रुप मैं विराजमान हैं, चाय और इडली की स्वरांजली स्पष्ट सुनाई पडती है, बार-बार लगातार।
शुक्रवार, 30 जुलाई 2010
अधुरा मिलन

6 सितम्बर 1995
आज दूर से खङे होकर लहरों को गीनने कि कोशिश करता रहा।कई छोटी बङी बूंदे चहरे तक पहूंची हीं थी कि अचानक समय के ख्याल से चौंक पङा। घङी की लगातार घूमती सुई शाम के पाँच बजने का ईशारा कर रही थी। एक अजीब सी हलचल सीने में उठने लगी, समुन्दर के सारी लहरों को मैं अपने अंदर महशूस कर रहा था । लहरों का संगीत मीठा होते हुऐ भी शोर सा प्रतीत हो रहा था। अचानक एक अवाज ने धङकन को और तेज कर दिया, पल भर कि घबराहट एक अजीब से नशे का अनूभव करा रही थी।
"कब से इन्तजार कर रहे हो।"
ये शब्द जैसे मेरे कानो में पारे कि तरह पिघलते चले गये, मैंने बहुत कोशिश कि, की मैं अपने अंदर चल रहे भाव को चहरे पर न आने दूँ पर जैसे हि मैं उसकी तरफ मुडा मेरी धङकने बहुत तेज चलती ट्रेन कि तरह भागने लगी। जैसे तैसे अपने भीतर चल रहे कशमकश को नियंत्रित कर के मैने ज़वाब दिया...
"बस अभी थोङी देर हिं हुआ है"
लाख़ कोशिशो के बाद भी मेरे भीतर चल रही कशमकश को उसने मेरे चहरे पर पढ लीया
"सौरी तुम्हे इन्तजार करना पङा"
"चलो चल कर कहीं बैठते हैं"
हम थोडी दूर में रखी बेंच पर जा कर बैठ गये। अभी ख़ामोशी के कुछ पल हि बीते थे की उसने मुझसे सवाल किया
"कहीं चाय पीने चलें"
"हाँ क्यों नही चलो" मैने कहा..
अभी मैं पूरी तरह खङा भी नही हुआ था की उसका फोन बज उठा। वो फोन पर बात करने लगी और मैं उसे तब तक टकटकी लगाऐ देखता रहा जब तक उसने फोन नही रख दिया, और फोन के रखते हीं उसने कहा..
" देखो तुम बुरा मत मानना मुझे किसी ज़रुरी काम से जाना है, हम कल साथ में जरुर चाय के लीये जाऐंगे"
और वह ये कह कर चली गई । मैं उसे दूर तक जाता हुआ तब तक देखता रहा जब तक वो आँखो से ओझल नही हो गई। मैं फिर से लहरों को गीनने कि कोशिश करता रहा, और मन हि मन आने वाले कल कि तस्वीर उन उठती गिरती लहरों में बनाता रहा।
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