"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

विवशता

४ जुलाई २००१ 
दिल्ली की तरफ वापसी का सफ़र शुरू हुआ ! कितनी ही आशाओ तथा अभिलाषाओं को संचित कर पुरे उल्लास से समय के व्यतीत होने का इंतजार कर रहा हूँ ! कल रात दिल्ली पहुच पाऊँगा, बड़ी विवशता से भरे हैं ये शब्द !
स्टेशन पर रहने वालो की जिंदगी कितनी संकीर्ण है, पग पग पर बेबसी तथा लाचारी मुह खोले अजगर के समान मिलती है ! पल भर गाड़ी बरौनी स्टेशन पर रुकी, मैं खिड़की में से चलायमान चिरजीवियों को देख रहा था शायद कुछ सोंच रहा था ! रह-रह कर चाय और पूरी के शब्दों की गर्जना कानो में पड़ती थी, तभी एक आवाज़ ने मेरी तन्द्रा भंग की
"बाबु जी ज़रा पैर हटाइये"
मैंने मुड कर देखा तो एकाएक घृणा के भाव से पल भर को होकर गुजर गया ! एक बूढ़ा सा दिखने वाला ईन्सान जिसके पेट के ऊपर के हिस्से में हड्डियों का कंकाल बना था, पेट लगभग भीतर की और सटका पड़ा था, चेहरे पर गरीबी से तंग पड़ गई झूर्रियाँ आ गई थी, मांस तो सिर्फ हड्डियों को ढकने के लिए था, दोनों कंधे आपस में जुड़े जा रहे थे, मैली सी धोती पहने, हाँथ में झाड़ू लिए डिब्बा साफ़ करता बोला...

"बाबु जी ज़रा पैर हटाइये"

मैंने पैर ऊपर कर लिया वह झाड़ू लगता आगे निकल पड़ा अभी उसकी शक्ल पूरी तरह धुंधली भी नहीं हुई थी की वह वापस मेरे सामने हाँथ फैलाये खड़ा था इस इंतज़ार में की उसकी भूख को कुछ पल के लिए दबाया जा सके, जो पैसे मिलते उसे वह अपने परिवार पर खर्च करता ! इस वक़्त वह अकेला नहीं था उसका लगभग सात या आठ वर्ष का लड़का झाड़ू के भार को सहता अमुक मेरी तरफ देख रहा था, अन्यथा ही मैं उसके भार को महसूस कर रहा था ! मैंने जेब टटोला पाँच का नोट निकलते हुए मैंने उस लड़के की तरफ बढाया, उस व्यक्ति ने लड़के से कहा...

"जा ले ले बाबूजी ख़ुशी ख़ुशी दे रहें हैं "

पर लड़का न जाने किस संकोच से पिता की आढ में खड़ा हो गया, शायद उसका अहं यह मंज़ूर नहीं कर रहा था ! वह व्यक्ति नोट लेकर चला गया ! मैं वापस खिड़की में झाकने लगा ! दूर सीढियों के किनारे कुछ मैले कपडे का ढेर पड़ा था ! कुछ मैले से बर्तन थे, और फटा पुराना तकिया बड़ी सावधानी से लगा रखा था ! वही व्यक्ति वहां जाकर लेट गया उसकी पत्नी उसे पंखा झेलने लगी उसका लड़का वहीं उसी के साथ आढ लेकर सो गया ! उस व्यक्ति ने अपनी पत्नी को क्या जिंदगी दी की जिसके बाद पत्नी ने इतना त्याग किया इतनी सेवा की उसकी ! क्या उसके भाग्य में केवल स्टेशन से मिले भीख पर गुज़ारा करना बदा था ! वह चाहती तो इन सब को छोड़ कहीं उससे बेहतर जिंदगी गुज़ार सकती थी उसके पति ने उसे ऐसा क्या दिया था जिसके कारण उसने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया ! क्या कोई मोह इतना सब करवा सकता है या फिर किसी मज़बूरी में इंसान इतना बेबस हो जाता है की उसे कोई और राह सूझती नहीं ! 
मेरी गाड़ी चल पड़ी ! में अभी भी अँधेरे में आँखे फाड़े उनकी तरफ देखने की कोशिस कर रहा हूँ ! दोनों सो रहे हैं और वो औरत जिसे उसके पति ने तंगहाली में जिंदगी गुज़ारने का जरिया दिया वह अभी भी उसे पंखा झेल रही है !

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर अभिवक्ति की है किसी के दर्द की और बेबसी की

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  2. बहुत संवेदनशील अभिव्यक्ति है. हम कई बार ज़िन्दगी की ऐसी बेबसी देखकर यु ही गुजर जाते है आपने उन एहसासों को बड़े ही सुन्दर शब्दों में ढला है. इसी तरह लिखते रहे.

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