"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष
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शनिवार, 24 दिसंबर 2011

अनमने से ख़याल

कुछ अनसुलझे, अनमने से ख़याल यूँ ही ज़हन में बरस जाते हैं...और दस्तक दे जाते हैं उन सोई हुई, डरी सी, सहमी हुई यादों को जिन्हें फिर से जीना एक युग गुजर जाने के समान है !
आज भी मैं उन पगडंडियों पर से रोज़ गुजरता हूँ, जहाँ बरसो पहले तुम्हारे पांव में कांटा चुभा था !
अब वो कांटा मेरे पांव में रोज़ चुभता है..... ये चुभन ही मेरे दर्द को सकूं पहुचाते हैं.......!




 जिंदगी     तुझसे     तो     कुछ      गिला     नहीं,
जिसे    दिल    से   चाहा    बस   वो  मिला   नहीं,
यूँ     तो     हज़ारो    लोग    जिंदगी    में    मिले, 
कोई  दिल   से   न  मिला, किसी से दिल मिला नहीं !





भुलना मुशकिल है उसे जो मुझे भुला गया,
हो  के  मुझसे  दूर  जो  मुझको  रूला  गया,
ख़ुदा   करे   वो  ख़ुश   रहे   जहां    भी   रहे,
कोई तो सूने दिल  में  कलियाँ  खिला गया !

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

ख्वाबों में चले आओ




मुनासिब हो तो ख्वाबों में चले आओ तुम पल भर को
तुम्हे देखे बिना  गुजरेगा क्या ये भी  साल, लगता  है

तुम्हारा ज़िक्र  तुम्हारी  बात जब आती है महफ़िल में
आईने  पर  उदासी  देखना  भी क्यों  कमाल  लगता है

तुम्हारे अक्स  से करता  हूँ बातें  तन्हा स्याह रातों  में
तुम्हारे अक्स से बेहतर क्यों तुम्हारा ख़याल लगता है

चांदनी रात कट जाती  है  यूँ तो,  अक्सर  जागते तन्हा
अश्क से भीगा हुआ तकिया मुझे क्यों रुमाल लगता है

कोई जब पूछता, कैसे जीते हो "संतोष" उसके बिन तन्हा
हँसी   में  टाल देता हूँ  मुश्किल  बहुत ये सवाल लगता है

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

तुम्हे भी याद सताती होगी

तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी
अम्बिया की डाली पर बैठी
जब भी कोयल गाती होगी
सांझ ढले जब चाँद फलक पे
चुपके से आ जाता होगा
घर, आँगन तुलसी के आगे
तुम जब दीप जलाती होगी

तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी

जब मंदिर में फूल चढाने
नंगे पावं बढाती होगी
जब ऊँची घंटी तक तेरे
हाँथ नहीं पहुचते होंगे
पंडित से लगवाने टीका
जब तू सर को झुकाती होगी
अपने संग मुझे न पाकर
आँख तेरी भर जाती होगी
   
तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी

हाँथ पे मेहँदी से जब सखियाँ
नाम मेरा लिख जाती होंगी 
तेरा दुपट्टा जब भी सर से
काँधे पर ढल जाता होगा
और आंटे से सने हाँथ से
रोटी जब तू बनाती होगी
आँचल को सर पर रखने को
जब आवाज़ लगाती होगी

तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी

जब माथे पर ले कर मटका
पनघट से तुम आती होगी
जब भी सावन आता होगा
झूले जब भी पड़ते होंगे
संग सखियों के बैठ हिंडोले
जब तुम पींग बढाती होगी
दूर कहीं बंसी की धुन फिर
मेरी याद दिलाती होगी

तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी

बारिश के मौसम में जब
बादल से बूंद बरसती होगी
आँगन, गलियां, खेत, गाँव जब
पानी से भर जाते होंगे
और जाड़े की कड़क ठण्ड में
सर्दी जब बढ़ जाती होगी
बैठ अंगीठी के आगे तुम
जब जब आग सुलगाती होगी


तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी
अम्बिया की डाली पर बैठी
जब भी कोयल गाती होगी

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

खुश्क पत्तों का मुकद्दर ले कर





खुश्क    पत्तों    का    मुकद्दर    ले     कर
आग  के  शहर में रहता हूँ ऐक घर ले कर

खौफ़ मुझको न कभी तेज़ हवाओं का रहा
मैं बिखरा हूँ तेरे इश्क का हर असर ले कर

लोग बारिश से संभलने का हुनर पुछते रहे
मैं   लौटा  हूँ  आँखो  में  समनदर  ले  कर

खुश्क    पत्तों    का    मुकद्दर     ले    कर
आग  के  शहर में रहता हूँ ऐक घर ले कर

सोमवार, 28 नवंबर 2011

अनदेखे ख्वाब

तुम्हारे साथ के
कुछ भीगे सावन
अब भी गीले पड़े हैं
उम्र गुजर रही है
मगर होंठ
अब भी सिले पड़े हैं
कुछ चाहतों के दबे ख़त
कुछ ख्वाहिशों की अधूरी
ग़ज़ल
रात के दुसरे पहर में
अनदेखे ख्वाब
सिसक उठते हैं
और आँगन के
गमले में
पोधों के पत्ते
अब तक पीले पड़ें हैं

तुम्हारा नाम
नीली स्याही से
मेरी हथेलियों में
अब भी मिटा मिटा सा है
मुझे नहीं पता
मेरी किस्मत में तुम
कितनी हांसिल हो
चलो दूर सही
तुम मेरी हिचकियों में
अब भी शामिल हो !!

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

बहुत तन्हाईयाँ हैं मेरे हिस्से में...



बहुत तन्हाईयाँ हैं मेरे हिस्से में चुरा लो तुम
तुम्हारा साथ मेरी तनहाइयों से कुछ तो बेहतर है

ज़िन्दगी कब तलक देगी मुझे उपहार में धोका
चलो धोका सही पर ज़िन्दगी से कुछ तो बेहतर है

कभी बारिश कभी झूले कभी शबनम का मौसम था
चलो सब नम गए लेकिन किसी के गम से बेहतर है

है आदत हमको पीने की चलो मन मगर समझो
ये आदत यूँ ही रहने दो ये आदत हम से बेहतर है

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

दिल भी सूना सूना है

दुनियाँ  है  अंजानी  सी  और रास्ता  भी  अंजाना सा
तुम होते जो पास तो लगता कुछ जाना पहचाना सा

दूर  गए  हो  तुम  तो  जब  से  दिल भी सूना सूना है
आँगन  सूना  घर  भी   सूना  जैसे  एक  वीराना  सा

दिल की बातें दिल ही जाने मुझको इतना  मालूम है
तेरी  गलियों  में  फिरता  है  जैसे  एक   दीवाना  सा

जैसा  हूँ  में खुश  रहता हूँ  सबसे जब में ये कहता हूँ
सब  कहते  हैं  मुझको  लगता  ये तो एक बहाना सा

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

दिल में अभी दर्द का तूफ़ान बाकी है

दिल  में  अभी  दर्द  का  तूफ़ान  बाकी  है
इस  इश्क का होना अभी अंजाम बाकी है

आँधियों  में  बह  गऐ  हैं  तिनके - तिनके
खुद के बिखरने का बस अरमान बाकी  है

जिस  घर  को  सजाया  था हांथो  से  अपने
उस घर  का  बिखरा  हुआ सामान बाकी है

माना की ज़ख्म भर  गया  जो तूने दिया था
लेकिन अभी उस ज़ख्म का निशान बाकी है

दुनियाँ  मे  हर  शय  से  पाया है सिर्फ धोका
अब आज़माने को बस ऐक भगवान बाकी है

शनिवार, 18 जून 2011

ये बारिशें भी तुम सी हैं

ये बारिशें भी तुम सी हैं
कभी कभी तो मूसलाधार
कभी कभी गुमसुम सी हैं
ये बारिशें भी तुम सी हैं
जो खुश हुई तो रिमझिम सी फुहार
जो रूठ गई तो बरसती बेशुमार
कभी कभी बे मौसम सी हैं
ये बारिशें भी तुम सी हैं
कभी धूप में कभी छाओं में
कभी शहर में कभी गाँव में
कभी इंद्रधनुष के बगैर ही
कभी इंद्रधनुष की पनाहो में
ये मीठी मीठी धुन सी हैं
ये बारिशें भी तुम सी हैं

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

आदतन

वक़्त,
आज फिर तेरी
देहलीज़ से गुजरा
ख्वाब के टुकड़े पड़े थे राह में
चंद साँसे बैठ कर
सोंचा वहाँ
रातरानी फिर से

बो दूँ राह में
खुशबुओं की
फिर फसल लहरायेगी
डाल पर झूले पड़ेंगे प्यार के
फिर हवा जुल्फों से खेलेंगी कहीं
कोयलें छेड़ेंगी राग मल्हार के
 

फिर मेरे आँखों में आँसू आ गया
दफ्न वो ख़त है
अभी तक सीने में
तुम गई
तो साथ खुशियाँ भी गई
अब कहाँ खुशबू मिलेगी जीने में
रातरानी उग भी जाये
तो भी क्या
वो हवा और कोयलें
देखेंगी तेरा रास्ता !

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

बेवफा जिंदगी

बेवफा जिंदगी 
ढूंढता दरबदर
इस शहर, उस शहर 
गली-गली, डगर-डगर 
ठोकरें मिली फकत
था आंसुओं का एक नगर
न जाने कब डुबो गई
वो नफरतों की एक लहर 
वो वक़्त था, सशक्त था 
बहता रगों में रक्त सा 
कुछ दास्ताँ थी अनकही 
पर कहने से लगता था डर
साहिल पर गीली रेत का
ख्वाबों में था छोटा सा घर 
मासूम सा एक ख्वाब था 
डुबो गई जिसे लहर

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

ज़िंदगी

ज़िंदगी को हादसे की तरह देखा
कभी छुआ कभी फेंका
कल्पनाओं की लड़ियाँ सजाता रहा
खुद से दूर जाती चीज़ को बुलाता रहा
दूर तक देर तक
अनजाने चेहरे से अपना सवाल दोहराता रहा
सब घूरते थे गुज़र जाते थे
मेरे सपने जो अनमोल थे मेरे लिए
गिरते थे टूट कर बिखर जाते थे

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

पलछिन

आँखे........
"सनम" 

आपकी आँखे 
बहुत खूबसूरत हैं
हमसे बहुत कुछ कह देती हैं
इनका ख्याल रखना
क्योंकि
कोई है
जो इन्हें देखकर
अपनी जिंदगी जीता है !

खवाब..........
तुम मिले
तो खवाबो से
दोस्ती हो गई
जब तुम सामने थी
तो ख्वाब
आँखों के सामने था
अब नहीं हो तो
ख्वाब आँखों के भीतर हैं !

यादें.......
कब सोंचा था
की ख्वाब यादों में
सील से जायेंगे
तुम्हे हो न हो
मुझे
अब भी याद है
तुम्हारे ख्वाब
शब्दों की रेशमी शाल ओढ़े
वो छोटा सा घर हो
जगह मुख़्तसर हो
ज़रा भी हम घूमे
बस टकरा से जाएँ !

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

"तुम"

"तुम" को तोडा मैंने जब भी
अक्षर मैंने दो पाया 
"तू" से तुम हो "म" से मैं हूँ
राज़ समझ मैं जब आया
तुम तो केवल तुम नहीं हो
मैं भी केवल मैं ही नहीं हूँ
या फिर कह लो हम ही हम हैं
फिर काहे की बात का गम हैं
तोड़ो मोड़ो शब्द बनाओ
"तू" से तुम्हारा "म" से मन है
कुछ शीतल है कुछ चन्दन हैं
कुछ शीतलता मुझको दे दो
मैं भी कुछ चन्दन हो जाऊँ

और कभी फिर निश्चल भाव से तुमको पाऊँ
"म" से मेरा "तू" से तुम्हारा
जो मेरा वो सब है तुम्हारा
हमारा कह ले जब हम ही हम हैं
फिर काहे की बात का गम हैं
तोड़ो मोड़ो शब्द बनाओ
"तू" से तुम हो "म" से मैं हूँ  !!

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

मैं हूँ प्रियवर प्राण तुम्हारा

मैं हूँ प्रियवर प्राण तुम्हारा
तुम कोमल रजनीगंधा हो
मैं हूँ रात अमावस काली
तुम अनमोल सुगंध संध्या हो

मैं वीणा तुम तार हो सखी
मैं चाहत तुम प्यार हो सखी
तुम हो सात स्वरों में रंजित
ऋतू वर्षा मल्हार हो सखी

मैं कपास अवांछित वन का
तुम पुलकित पलाश उपवन का
मृग-तृष्णा मैं मरुस्थल में
तुम सुगन्धित चन्दन वन का

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

वर दे वर दे हे माँ दुर्गे


वर दे,     वर दे,    हे     माँ दुर्गे
पाठक  से  मेरा ब्लॉग तू भर दे

ब्लोगिंग  लगे रीत  अब न्यारी
रिश्तों    की   भी    जिम्मेवारी 
रूठी   पत्नी  प्रिय   अति प्यारी
उसे   मनाने   का   अवसर  दे



वर दे,    वर दे,     हे    माँ दुर्गे

जो  लिखूं   वो  हिट  हो जाये
लिखूं   मलता  फिट हो जाये
टिप्पणी अनलिमिट हो जाये

ब्लोगिंग का  ऐसा तू हुनर दे 

वर दे,   वर दे,    हे    माँ दुर्गे

रस,  अलंकार, छंद, उपमाएँ
लिखे चुटकुलों पर कवितायेँ 
बेनामी  भी  सर  को झुकाएँ
हो  जाये  कुछ  मंतर  कर दे


वर दे,   वर दे,   हे    माँ दुर्गे

ब्लोगिंग का चर्चा है यार में 
नाम  हो  गया  कारोबार में
घूमू  बनकर  सेठ   कार  में
ऐसी   लाटरी   मेरे   घर  दे


वर दे,   वर दे,  हे    माँ दुर्गे


आप सभी को नवरात्रि के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं !

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

आज और कल हर एक पल

यूँ ही कभी जाने अनजाने तुम्हारा ख्याल जब भी ज़हन पर यादों की सिलवटें बन जाया करता है तो चाहतों में तुम्हारे लिए अब भी दुआएँ ही निकलती हैं ! फकत दुआएँ !


आज और कल
हर एक पल
कस्तूरी की महक में
डूबी हुई शाम की तरह
एक नाम के साथ
एहसास का नयापन
हजारो लाखो तारों के बीच
अकेला चाँद
सिर्फ तुम
तुम्हारा नाम
कुछ चांदनी
कुछ सुनहरी रात
दामन में तुम्हारे
बिखरे हर पल
एक स्तब्ध हलचल
तुम्हारे घर आना हो खुशियों का
दरवाजे पर
नई शाम का पहरा
कुछ बादल
कुछ ऊँचे पर्वत
रंग बिरंगी तितलियों के पर
आँगन में
और एक
नन्ही सी तुलसी
रात की काजल मैं भीगी
शबनम की खुशबू
धुंआ-धुंआ सा उड़ता बादल
आज और कल
हर एक पल

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

लालच के बंधन को तोड़ो



अपना  तो  बस  यही  नारा   है
जो  मिला  हमें  वही  प्यारा  है
जो  नहीं  मिला   उसको  छोड़ो
लालच   के   बंधन   को  तोड़ो

जितना हो भाग्य  में मिलता है
मेहनत  का फूल भी खिलता है
बिन हवा शाख कब  हिलता है 
कोशिस करना तुम मत छोड़ो
लालच  के   बंधन   को  तोड़ो

मत  आस  करो हक़ से ज्यादा
मत  बनो   रास्ते  की   बाधा
अब  बीत  चूका जीवन आधा 
मन  का  रिश्ता जन से जोड़ो
लालच  के  बंधन  को   तोड़ो  

जागो  मन से कुछ काम करो
निष्पाप  करो निष्काम  करो 
मत  व्यर्थ  यूँही  आराम करो
जीवन पथ  को सच से जोड़ो
लालच  के  बंधन  को  तोड़ो

जो  कहा  सुना सब माफ़  करो
मन  की   दुर्बलता  साफ़  करो
मानवता  का   इन्साफ   करो
गुण को लो अवगुण को छोड़ो
लालच  के  बंधन   को  तोड़ो

है जन्म लिया इस धरती पर
माँ  के  चरणों  में  है  अम्बर
दुष्टों   के   चालो   में   आकर
मत मात पिता को तुम छोड़ो
लालच  के  बंधन   को  तोड़ो

करना, मन में  जब  ठानी है
जीवन  तो  बहता  पानी  है
जब खून में जोश जवानी है
धमनी में रक्त सा तुम दौड़ो
लालच  के  बंधन को तोड़ो

तुम विजय रहो निर्माण करो
भारत के वीर सपूत  हो तुम
मत मातृभूमि का दान करो
विषधर  के  सर  को  फोड़ो 
लालच  के  बंधन  को तोड़ो

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

ख़त को ख़त ही रहने दो

ख्वाबों को देखता हूँ
सीढियों से उतरते
गुज़रते
दबे पाँव
नज़रें चुराते
गलियारों से
और उधर
तुम्हारे तकिये कि नीचे
वो लम्हा
चुराकर रखा
है अब तक
और लिफाफे में
इश्क के
हज़ारों जगरातें 
जुगनू तितली बादल मंजर
छोड़ो ख्वाबों कि बातें
तुम कहो
जूही के पौधे पर
फूल आ गए होंगे अब तो
क्या कहा
कैसे जाना
तुम्हारे ख़त में
खुशबू आती है उसकी
और हाँ
अगर हो सके
ख़त को ख़त ही रहने दो
ई मेल मत बनाओ
बेजान सी लगती हैं
बातें  

रविवार, 26 सितंबर 2010

कुछ पल तो तुम्हारे साथ रहूँ

तुम कहती हो तो
कह देता हूँ
लोगों का क्या
वो तो कविता ही समझेंगे

जब से तुम
गई हो
गमलो में 
पौधे हँसना भूल गए हैं
बरामदे में
धूप कि किरने
आती तो हैं, मगर
रौशनी कहीं घुल गई है

परिंदे भी छत पर
कम हो गए
उन्हें भी तो आदत थी
तुम्हारे हाँथो के बाजरे की
शाम को अक्सर अब
जल्दी घर लौटता हूँ
और दरवाजे पर ठिठक जाता हूँ
शायद मेरे कदमो की
आह्ट सुनकर तुम फिर से दरवाजा खोलो  

हूँ न बेवकूफ
सब जानता हूँ
फिर भी सपने बुनता हूँ
सपने में आज
तुम्हे देखा
जान भूझ कर रूठ गया था तुमसे
तुम मनाती हो
तो अच्छा लगता है
आँखे खुल गई
तो जबरदस्ती आँखे मूँद ली
सपनो में ही सही
कुछ पल तो तुम्हारे साथ रहूँ
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