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शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010
वर दे वर दे हे माँ दुर्गे
वर दे, वर दे, हे माँ दुर्गे
पाठक से मेरा ब्लॉग तू भर दे
ब्लोगिंग लगे रीत अब न्यारी
रिश्तों की भी जिम्मेवारी
रूठी पत्नी प्रिय अति प्यारी
उसे मनाने का अवसर दे
वर दे, वर दे, हे माँ दुर्गे
जो लिखूं वो हिट हो जाये
लिखूं मलता फिट हो जाये
टिप्पणी अनलिमिट हो जाये
ब्लोगिंग का ऐसा तू हुनर दे
वर दे, वर दे, हे माँ दुर्गे
रस, अलंकार, छंद, उपमाएँ
लिखे चुटकुलों पर कवितायेँ
बेनामी भी सर को झुकाएँ
हो जाये कुछ मंतर कर दे
वर दे, वर दे, हे माँ दुर्गे
ब्लोगिंग का चर्चा है यार में
नाम हो गया कारोबार में
घूमू बनकर सेठ कार में
ऐसी लाटरी मेरे घर दे
वर दे, वर दे, हे माँ दुर्गे
आप सभी को नवरात्रि के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं !
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
आओ मिलकर फुटबाल खेलें
आओ मिलकर फुटबाल खेलें
जय बम भोले जय बम भोले
भांग धतुरा पी के साधो
इधर उधर कि टीम में होलें
हम सब करें गोल पर गोल
जय रघुनन्दन जय सिया बोल
पंडित ढोंगी राम सुनो जी
तुम बस बजाओ ढोल पे ढोल
बांकी सब खेलें फुटबाल
नरक स्वर्ग सब बाद में होगी
हम भी जोगी तुम भी जोगी
फुटबाल खेलें बन कर भोगी
खेल खेलते जोर से बोलें
आओ मिलकर फुटबाल खेलें
जय बम भोले जय बम भोले
जय बम भोले जय बम भोले
भांग धतुरा पी के साधो
इधर उधर कि टीम में होलें
हम सब करें गोल पर गोल
जय रघुनन्दन जय सिया बोल
पंडित ढोंगी राम सुनो जी
तुम बस बजाओ ढोल पे ढोल
बांकी सब खेलें फुटबाल
नरक स्वर्ग सब बाद में होगी
हम भी जोगी तुम भी जोगी
फुटबाल खेलें बन कर भोगी
खेल खेलते जोर से बोलें
आओ मिलकर फुटबाल खेलें
जय बम भोले जय बम भोले
संता की परेशानी
संता कुछ परेशान सा घूम रहा था
अपने मन में जाने क्या सवाल बुन रहा था
पुरे घर में भटक रहा था
एक सवाल जो उसकी खोपड़ी में अटक रहा था
कि सारे चुटकुले संता पर ही क्यों बनते हैं
अरे दुनीयाँ में और भी तो लोग हैं
क्या हमी सिर्फ चुटकुले के योग्य हैं
हर चुटकुले हर बात में हमें ही घुसेड दिया जाता है
किसी की बेईजती करनी हो तो हमें ही भेड़ दिया जाता है
तभी संता की पत्नी मटकते हुए आई
मुस्कुराई फिर जोर से चिल्लाई
मैं तो तुमसे भर पाई
सुबह से एक भी काम नहीं किया
तुमने मुझे कौन सा सुख दिया
महीने हो गए मायके गए
कम से कम मायके ही घुमा लाते
मुन्ने ने बिस्तर पर पोट्टी की
पोट्टी वहीँ छोड़ दी
कम से कम मुन्ने को ही धुला लाते
पडोसी से सीखो
हर महीने अपनी बीवी को नए जेवर दिलाता है
देर रात तक बीवी के पैर दवाता है
सुबह से देख रही हूँ इधर से उधर मचल रहे हो
आखिर ऐसी कौन सी ग़ज़ल लिख रहे हो
संता बोला अरी बंतो मैं अपने ही सवाल से परेशान हूँ
तू अपना ही राग गा रही है
मदत करती हो तो बता वरना क्यों मेरा दिमाग खा रही है
हर बात हर चुटकुले में मैं दाखिल हूँ कहीं न कहीं
कोई ऐसी बात बता जिसमे मैं शामिल नहीं
बंतो बोली अजी वैसे तो हार बात आपसे होकर गुजरने वाली है
मगर एक बात जिसमे आप शामिल नहीं हो वो ये है जो बताने वाली है
हौसला रखना मैं बिलकुल सच कहने वाली हूँ
में एक और बच्चे की माँ बनने वाली हूँ
अपने मन में जाने क्या सवाल बुन रहा था
पुरे घर में भटक रहा था
एक सवाल जो उसकी खोपड़ी में अटक रहा था
कि सारे चुटकुले संता पर ही क्यों बनते हैं
अरे दुनीयाँ में और भी तो लोग हैं
क्या हमी सिर्फ चुटकुले के योग्य हैं
हर चुटकुले हर बात में हमें ही घुसेड दिया जाता है
किसी की बेईजती करनी हो तो हमें ही भेड़ दिया जाता है
तभी संता की पत्नी मटकते हुए आई
मुस्कुराई फिर जोर से चिल्लाई
मैं तो तुमसे भर पाई
सुबह से एक भी काम नहीं किया
तुमने मुझे कौन सा सुख दिया
महीने हो गए मायके गए
कम से कम मायके ही घुमा लाते
मुन्ने ने बिस्तर पर पोट्टी की
पोट्टी वहीँ छोड़ दी
कम से कम मुन्ने को ही धुला लाते
पडोसी से सीखो
हर महीने अपनी बीवी को नए जेवर दिलाता है
देर रात तक बीवी के पैर दवाता है
सुबह से देख रही हूँ इधर से उधर मचल रहे हो
आखिर ऐसी कौन सी ग़ज़ल लिख रहे हो
संता बोला अरी बंतो मैं अपने ही सवाल से परेशान हूँ
तू अपना ही राग गा रही है
मदत करती हो तो बता वरना क्यों मेरा दिमाग खा रही है
हर बात हर चुटकुले में मैं दाखिल हूँ कहीं न कहीं
कोई ऐसी बात बता जिसमे मैं शामिल नहीं
बंतो बोली अजी वैसे तो हार बात आपसे होकर गुजरने वाली है
मगर एक बात जिसमे आप शामिल नहीं हो वो ये है जो बताने वाली है
हौसला रखना मैं बिलकुल सच कहने वाली हूँ
में एक और बच्चे की माँ बनने वाली हूँ
बुधवार, 22 सितंबर 2010
बिजली कहाँ से आती है ?
स्कूल में मास्टर जी बच्चो का ज्ञान बढ़ा रहे थे
साईंस के टीचर थे सो विज्ञान पढ़ा रहे थे
ब्लैक बोर्ड पर सवाल लिखा, कि बिजली कहाँ से आती है ?
फिर अपनी पैनी निगाहों को चारो ओर घुमाया
और सोंच विचार कर रामू को खड़ा करवाया
बोले रामू तुम्हारी अकल्बंदी मुझे सबसे ज्यादा सताती है
तुम ही बताओ आखिर बिजली कहाँ से आती है ?
रामू खड़ा हो गया डर से
बोला मास्टर जी मामा के घर से
मास्टर जी बोले वो कैसे
रामू ने जवाब समझाते हुए मास्टर जी को फिर से मात दी
बोला बिजली जाती है तो पापा कहते हैं कि सालों ने फिर से काट दी !
कॉमनवेल्थ नहीं कम ऑन वेल्थ
कॉमनवेल्थ नहीं कम ऑन वेल्थ
कॉमनवेल्थ खेल के नाम पर जिसे मौका मिल रहा है अपनी जेब भरने में लगा है ! फ्लाईओवर, ब्रिज, जल्दबाजी में धड़ल्ले से बनाये जा रहे है, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि इन सस्ते काम का खामियाजा आम जानता को भरना पड़ता है ! नेहरु स्टेडियम का ब्रिज अभी बनके तैयार भी नहीं हुआ कि उससे पहले टूट कर गिर गया और हमारे नेता है कि कह रहे हैं कि ये छोटे मोटे हादसे होते रहते हैं ! ये कैसा कॉमनवेल्थ गेम है ! ये तो कॉमनवेल्थ कम और कम ऑन वेल्थ (come on wealth)जयादा लग रहा है !!
कॉमन वेल्थ के नाम पर, देश को रहे लूट
नेता जी घपला करें , पहन कर सूट बूट
पहन कर सूट बूट करोडो का चुना लगाया
खाए रूपए करोड़, हज़ार का पुल बनवाया
लूट खसोट कर जानता से है खूब कमाया
फ्लाईओवर का ठेका साले को दिलवाया
कॉमनवेल्थ का मतलब नेता जी समझाएँ
कम ऑन वेल्थ है मतलब, खूब रूपईये खाएँ
कॉमन वेल्थ के नाम पर, देश को रहे लूट
नेता जी घपला करें , पहन कर सूट बूट
पहन कर सूट बूट करोडो का चुना लगाया
खाए रूपए करोड़, हज़ार का पुल बनवाया
लूट खसोट कर जानता से है खूब कमाया
फ्लाईओवर का ठेका साले को दिलवाया
कॉमनवेल्थ का मतलब नेता जी समझाएँ
कम ऑन वेल्थ है मतलब, खूब रूपईये खाएँ
बुधवार, 15 सितंबर 2010
छक्के पे छक्का
लाली लगा होंटों पे, करके सुनहरे बाल
सफ़ेद साड़ी पहिनकर, बिंदी लगाईं लाल
बिंदी लगाईं लाल, पिया ज़रा देखो हमको
इस गेटप को पहनकर कैसी लगती तुमको
हम बोले श्री मति जी तुम लग रही हो ऐसे
एम्बुलेंस चला आ रहा हास्पिटल का जैसे
प्यार व्यार सब छोड़ कर, करो कविता पाठ
कविता से गुण बढ़त हैं, खड़ी प्यार की खाट
खड़ी प्यार की खाट सुन लो मिस्टर भल्ला
पकडे गए तो हो जाओ बदनाम मोहल्ला
कविता की मस्ती में सबकुछ पा जाओगे
खा कर प्यार में धोका एक दिन पछताओगे
सफ़ेद साड़ी पहिनकर, बिंदी लगाईं लाल
बिंदी लगाईं लाल, पिया ज़रा देखो हमको
इस गेटप को पहनकर कैसी लगती तुमको
हम बोले श्री मति जी तुम लग रही हो ऐसे
एम्बुलेंस चला आ रहा हास्पिटल का जैसे
प्यार व्यार सब छोड़ कर, करो कविता पाठ
कविता से गुण बढ़त हैं, खड़ी प्यार की खाट
खड़ी प्यार की खाट सुन लो मिस्टर भल्ला
पकडे गए तो हो जाओ बदनाम मोहल्ला
कविता की मस्ती में सबकुछ पा जाओगे
खा कर प्यार में धोका एक दिन पछताओगे
गुरुवार, 2 सितंबर 2010
मित्र जो ढूंडन मैं चला
मित्र जो ढूंडन मैं चला ढूँढा सकल जहाँन
फेसबुक किया सर्च तो मिल गए कल्लू राम
मिल गए कल्लू राम स्क्रैप हमने कर डाला
यहाँ छुपे बैठे हो कर के तुम घोटाला
लूटा हमसे जितने रूपए हमें लौटाओ
नहीं करोगे ऐसा कसम हमारी खाओ
इंटरपोल पड़ी पीछे तो होंगे फड्डे
कपडे लत्ते संग बिकेंगे तुम्हारे चड्डे
फेसबुक किया सर्च तो मिल गए कल्लू राम
मिल गए कल्लू राम स्क्रैप हमने कर डाला
यहाँ छुपे बैठे हो कर के तुम घोटाला
लूटा हमसे जितने रूपए हमें लौटाओ
नहीं करोगे ऐसा कसम हमारी खाओ
इंटरपोल पड़ी पीछे तो होंगे फड्डे
कपडे लत्ते संग बिकेंगे तुम्हारे चड्डे
मंगलवार, 31 अगस्त 2010
आरती गूगल जी की
मेरे परम प्रिय मित्र है कुलभूषण त्रिपाठी ! इनके इन्टरनेट के ज्ञान को बढ़ाने में सबसे जयादा योगदान गूगल का रहा है ! जब भी कंप्यूटर को हाँथ लगते हैं ॐ गूगलाय नमह कहते हैं ! इनकी गूगल जी के प्रति इतनी श्रधा भक्ति देख कर तो ये आरती करने का मन जरूर करता है !
जय गूगल देवा
स्वामी जय गूगल देवा
सीर्चिंग करवाकर तुम
करत जगत सेवा
ॐ जय गूगल देवा
ज्ञानहीन दुःख हरता
तुम अन्तर्यामी
स्वामी तुम अन्तर्यामी
सीर्चिंग करने में तुम
सीर्चिंग करने में तुम
हो सबके स्वामी
ॐ जय गूगल देवा
जो ढूंढें मिल जावे
कलेश मिटे मन का
स्वामी कलेश मिटे मन का
दोष अज्ञान मिटावे
दोष अज्ञान मिटावे
सकलत जन जन का
ॐ जय गूगल देवा
तुम हो ज्ञान के सागर
तुम ब्लोगर कर्र्ता
स्वानी तुम ब्लोगर कर्र्ता
मैं ब्लोगर अज्ञानी
मैं कमेंट्स संग्रामी
क्रपा करो भरता
ॐ जय गूगल देवा
जीमेल लिमिट बढाओ
करो प्रीमियम रहित सेवा
स्वामी प्रीमियम रहित सेवा
ब्लॉग स्पोट ऑरकुट का
ब्लॉग स्पोट ऑरकुट का
चखते सब मेवा
ॐ जय गूगल देवा
गूगल जी की आरती
जो कोई नित गावे
बंधू जो कोई नित गावे
जो ढूंढें सब मन से
आई ऍम फिलिंग लक्की बटन से
फर्स्ट पेज पर मिल जावे
ॐ जय गूगल देवा
सोमवार, 30 अगस्त 2010
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी विकट होती है
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी विकट होती है
मंडराते खर्चे के बादल जब भी कभी निकट होती है
सुबह सवेरे फ़ोन करेंगे
फ़ोन तो क्या मिस कॉल करेंगे
कर भी लिया फ़ोन चलो माना
अंत में बिल तो हम ही भरेंगे
आठ घंटे कॉल के बाद भी फ़ोन नहीं डीस्कनेस्ट होती है
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
शोपिंग तो सिर्फ माल में होगी
लंच डिनर हर हाल में होगी
उतर गया जब भूत डाइटिंग का
डेट फिर माक डोनाल्ड में होगी
पिक्चर का खर्चा भी महंगा पाँच सौ की टिकट होती है
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
दस लिपिस्टिक बारह सेंडिल
रोज़ रोज़ नए नए स्कैंडल
फरमाइश अभी पूरी भी नहीं
तभी टूट गया पर्स का हेंडल
कितने भी कंजूस बनो तूम खर्चे की ये एक्सपर्ट होती हैं
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
झूठे प्यार का हैं ये नमूना
लेकिन प्रेमिका बिन जगसुना
प्यार बढे जब हद से समझो
लगने वाला है तब चूना
छोटी छोटी बातों पर भी सारा दिन खटपट होती है
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
जासूसी करें नए नए वो
मेसेज बॉक्स भी चेक करे वो
टोक- टोक के आदत बदली
खुद ही कहें फिर बदल गए हो
बहस करो इस बात पर जब तुम झूट मूठ की हर्ट होती है
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
मंडराते खर्चे के बादल जब भी कभी निकट होती है
सुबह सवेरे फ़ोन करेंगे
फ़ोन तो क्या मिस कॉल करेंगे
कर भी लिया फ़ोन चलो माना
अंत में बिल तो हम ही भरेंगे
आठ घंटे कॉल के बाद भी फ़ोन नहीं डीस्कनेस्ट होती है
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
शोपिंग तो सिर्फ माल में होगी
लंच डिनर हर हाल में होगी
उतर गया जब भूत डाइटिंग का
डेट फिर माक डोनाल्ड में होगी
पिक्चर का खर्चा भी महंगा पाँच सौ की टिकट होती है
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
दस लिपिस्टिक बारह सेंडिल
रोज़ रोज़ नए नए स्कैंडल
फरमाइश अभी पूरी भी नहीं
तभी टूट गया पर्स का हेंडल
कितने भी कंजूस बनो तूम खर्चे की ये एक्सपर्ट होती हैं
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
झूठे प्यार का हैं ये नमूना
लेकिन प्रेमिका बिन जगसुना
प्यार बढे जब हद से समझो
लगने वाला है तब चूना
छोटी छोटी बातों पर भी सारा दिन खटपट होती है
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
जासूसी करें नए नए वो
मेसेज बॉक्स भी चेक करे वो
टोक- टोक के आदत बदली
खुद ही कहें फिर बदल गए हो
बहस करो इस बात पर जब तुम झूट मूठ की हर्ट होती है
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
सोमवार, 9 अगस्त 2010
शराबी
एक शराबी,
अपनी धुन में जा रहा था !
और मन ही मन कुछ खिचड़ी पका रहा था !
काफी रात हो चुकी थी !
सारी दुनीयाँ सो चुकी थी !
तभी अचानक पत्थर से जा टकराया,
कुछ भुन्नाया कुछ बडबडाया ,
इतने मैं एक पुलिस वाला जाने कहाँ से चला आया !
बोला तुम लडखडा रहे हो,
और कुछ बडबडा रहे हो,
इतनी रात में शराब पीके उधम मचा रहे हो !
खुद का गली का गुंडा समझते हो !
दिखता है हाथ में क्या है,
पुलिस का डंडा है !
पुलिस खुद अपने आप में एक गुंडा है !
सभी गुंडे हमसे डरते हैं !
क्या आप इतनी रात मैं इस सड़क पर घूमने की कोई वजह बता सकते हैं !
शराबी ने हाथ जोड़ा,
बोला भाई साहब रहम खाइए थोडा,
अगर मुझे वजह मालूम होता ,
तो २ घंटे पहले अपनी बीवी के पास न चला गया होता !
अपनी धुन में जा रहा था !
और मन ही मन कुछ खिचड़ी पका रहा था !
काफी रात हो चुकी थी !
सारी दुनीयाँ सो चुकी थी !
तभी अचानक पत्थर से जा टकराया,
कुछ भुन्नाया कुछ बडबडाया ,
इतने मैं एक पुलिस वाला जाने कहाँ से चला आया !
बोला तुम लडखडा रहे हो,
और कुछ बडबडा रहे हो,
इतनी रात में शराब पीके उधम मचा रहे हो !
खुद का गली का गुंडा समझते हो !
दिखता है हाथ में क्या है,
पुलिस का डंडा है !
पुलिस खुद अपने आप में एक गुंडा है !
सभी गुंडे हमसे डरते हैं !
क्या आप इतनी रात मैं इस सड़क पर घूमने की कोई वजह बता सकते हैं !
शराबी ने हाथ जोड़ा,
बोला भाई साहब रहम खाइए थोडा,
अगर मुझे वजह मालूम होता ,
तो २ घंटे पहले अपनी बीवी के पास न चला गया होता !
गुरुवार, 29 जुलाई 2010
दिवाली

मुझे याद है जब मै छोटा था। दिवाली का पूरा साल इन्तजा्र रहता था। दिवाली में जब बम पटाखे फोडते थे तो कइ पटाखे फुस्स हो जाते थे, मगर बचपन मन कब मानता है, उस फुस्स बम को उठाकर फिर से एक बार फोडने कि कोशिश करते,इसी कोशिश मे एक बार एक बम के अन्दर का कंकड मेरे पैर मे लग गया, एक बार तो चीख निकल गइ,फिर अगले हीं पल खुद के मनोभाव को नियंत्रीत किया की कोई हमारा मजा्क ना उडाऐ।
बस इसी भाव ने इस हास्य कविता को जन्म दिया।
हम समझ चुके थे की हमारा वक्त जल्द हीं बदलने वाला है।
जिसे हमने दिवाली समझी वो दिवाली नही दिवाला है।
हुआ ये कि हमारे पैर में चोट लग गई,
किसी बद्ददुआरी के दिल कि खोट लग गई।
कहीं से बम का पत्थर उडता हूआ आया,
हमारे दायें पैर कि कानी अंगुली से जा टकराया।
बस फिर क्या पाँच मिनट में अंगुली नीली हो गई,
दर्द से हमारी चड्डी गीली हो गई।
कुछ लोग हँस कर मेरा मजा्क उङाते थे।
हम भी उनके साथ हँस कर झेप जाते थे।
खैर चोट लग ही गया था तो क्या करते,
घर पहुँचे गिरते पडते।
अब हम समझ चुके थे की फुस्स हुऐ बम फोडने का परिणाम क्या होता है।
असावधानी से दिवाली मनाने का अंजाम क्या होता है।
उपर से तो मुस्कुरा रहे थे, अन्दर हीं अन्दर बहुत पीडा हो रही थी।
ओर ना जाने लक्ष्मी माता किसके घर में सो रही थीं,
लक्ष्मी जी आती तो उनके पैर पकड लेते।
लाकर दो हाँथ कि रस्सी उन्हें बन्धन में जकड लेते।
माँगते वरदान,
की हे लक्ष्मी माँ करो कल्याण।
हमें ऐसा बम दो,
जिसकी कीमत कम हो।
कीमत कम होगी तो अधिक बम खरीद पाऐंगे,
फुस्स हुऐ बम फिर कभी नहीं जलाऐंगे,
फिर हम नहीं तुमसे कुछ फरीयाद करेंगे,
उसके बाद हीं तुम्हें बन्धन से आजाद करेंगे।
जब हमारा घर धन से भर जाऐगा,
पडोस का लाला जल भून कर मर जाऐगा।
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