"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष
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बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

पलछिन

मैं और मेरी हमनफस
(1) अंकुर.......
कल शाम 
खयालो की पोटली 
भिगोई थी
आज देखा तो
उनमे अंकुर निकल आये हैं
आज शाम जब मिलोगी
तो चाशनी के साथ
तुम्हे परोसुंगा !


(२) निशानी.......
याद है 
तुम्हे चूड़ियाँ पहनाते वक़्त
मेरी उंगुली कट गई थी
वो जख्म
जिस पर तुमने
मलहम लगाया था
उसे मैंने
फिर से कुरेद दिया है
तुम्हारे जाने के बाद
कुछ तो तुम्हारी निशानी होनी चाहिए !

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

पलछिन

आँखे........
"सनम" 

आपकी आँखे 
बहुत खूबसूरत हैं
हमसे बहुत कुछ कह देती हैं
इनका ख्याल रखना
क्योंकि
कोई है
जो इन्हें देखकर
अपनी जिंदगी जीता है !

खवाब..........
तुम मिले
तो खवाबो से
दोस्ती हो गई
जब तुम सामने थी
तो ख्वाब
आँखों के सामने था
अब नहीं हो तो
ख्वाब आँखों के भीतर हैं !

यादें.......
कब सोंचा था
की ख्वाब यादों में
सील से जायेंगे
तुम्हे हो न हो
मुझे
अब भी याद है
तुम्हारे ख्वाब
शब्दों की रेशमी शाल ओढ़े
वो छोटा सा घर हो
जगह मुख़्तसर हो
ज़रा भी हम घूमे
बस टकरा से जाएँ !
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