"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष

सोमवार, 13 सितंबर 2010

चाँद तुम्हारे छत पर उतरा था

कल रात
मैंने खिड़की से देखा
चाँद तुम्हारे छत पर उतरा था
कुछ तो बातें कि होगी तुमसे
यूँ ही नहीं वो गया होगा 

उस वक़्त
जब तूम विदा करने आई थी
चाँद को
गलियारे में
मैंने पहचाना नहीं
दोनों में से तुम कौन हो

और आज सुबह
जब तुम मंदिर में खड़ी थी
आँखे मूंदे
मैंने चुपचाप देखा था तुम्हे
सीढियों से
तुम्हारी बिंदिया
अरे
वो चाँद याद आ गया फिर से मुझे

आज अमावस है
जानता हूँ
आसमान में नहीं निकलेगा चाँद आज
मगर तुम छत पर जरूर आओगी
मुझे क्या
मुझे तो अपने चाँद से मतलब है  

रविवार, 12 सितंबर 2010

ख्वाब

तुम एक
ख्वाब हो
जिसे देखना
मेरी आदत है
खुली पलकों से
हर घडी
हर पल
हर क्षण
व्याकुल मन
तुम्हारे आने कि
प्रतीक्षा मैं
अपलक
देखता उन राहों को
जिसपर तुमने कभी
पैर भी न धरे
फिर भी इस आस पर
कि यह ख्वाब
आशाओं कि गलियों से होकर
तुम्हारे पलकों के
आँगन तक पहुचे
तो शायद
मेरी प्रतीक्षा में
न्यूनता आये !!

सोमवार, 6 सितंबर 2010

तलाश एक बार फिर


वक़्त गुजरा
सदियाँ बीती
एक उम्र बसर हुई
आज न जाने क्यों
यादों की बंद खिड़की को खोल
उन झरोखों से झाकने का दिल हुआ
जिन्हें लम्हों के जाले ने धुंधला कर दिया
आँखों का खुद पर से भरोसा उठ गया
खिड़की के उस पार का 
वो पल
अब भी वहीँ थमा हुआ था,
जिस वक़्त मेंने खिड़की बंद की थी
वो फेरीवाला आज भी
खट्टी मीठी गोलियाँ की आवाज लगता
गली के नुक्कड़ पर
ओझल हो जाता है आँखों से
में बेतहाशा भागता हूँ
उसकी और
और दुसरे गली के नुक्कड़ पर
उसे पकड़ ही लेता हूँ
चेहरे पर ख़ुशी
पल भर के लिए आती है
और पल में ही काफूर हो जाती है
जब मेरी इकलौती अठन्नी
जेब में नहीं मिलती
इस भागा-दौड़ी में
इकलौती अठन्नी
जाने कहाँ खो गई
ढूँढता हूँ बेसब्र होकर
सिर्फ अठन्नी खोई होती तो
शायद
मिल भी जाती
किस्मत भी कहीं ग़ुम हो चुकी थी
मगर तब तलक ढूंढता रहा
जब तक
उजालों ने मेरा साथ न छोड़ दिया
मगर खिड़की के इस पार
आज यही हालात थे मेरे
जीवन की भागा- दौड़ी में
कुछ रिश्ते
जाने किन पड़ाव पर खो गए
क्या उस अठन्नी जितनी कीमत भी नहीं
इन रिस्तो की
तो क्या इन्हे यूँ ही खोने दूं
एक बार फिर
तलाश करनी है
उस अठन्नी की
इन रिस्तो की शक्ल में
किस्मत कभी तो मेरे साथ होगी हीं !!! 

रविवार, 5 सितंबर 2010

चंद लफ़्ज़ों में डूबी इश्क की दास्ताँ

चंद लफ़्ज़ों में डूबी इश्क की दास्ताँ 
लिखने बैठूं तो पूरी स्याही ख़त्म हो जाएगी 
वो उनके चेहरे पर मंद मंद सी मुस्कराहट 
समेटने बैठूं तो पूरी जिंदगी ख़तम हो जाएगी
एक रोज़ यों ही मुलाक़ात हो गई राह में
अजनबी थे मगर कुछ तो था दोनों के एहसास में
आते जाते अक्सर मुलाकाते होने लगी 
जान पहचान बढ़ी फिर बातें होने लगी
अब जब भी मिलते थे घंटो बात किया करते थे
एक दुसरे की आँखों में सपने पाला करते थे
न वक़्त के गुजरने का होश,
न ही दिन के ढलने का ख्याल 
दिल बस यही सोंचता 
की कब रात ढले और कब उनका दीदार हो
कब उनके लब खुलें
कब बारिश मुसलाधार हो
दोनों की नजदीकियाँ बढ़ने लगी
दोनों का खुमार बढ़ने लगा 
कुछ पता नहीं चला कब दोनों में प्यार बढ़ने लगा 
न ही भूख लगने की फ़िक्र 
न ही किसी काम का होश 
चंद मिनटों के लिए कुछ कहते
फिर घंटो तक खामोश 
दिन जैसे बड़ी तेजी से पंख लगा उड़ता जा रहा था
और वो बस एक दुसरे की आँखों में अपना सपना सजाने लगे थे
खयालो में जीना, सपने सजाना
तस्सवूर में खोना, वो रूठना मानना 
अल्ल्हड़ वो मस्ती, वो शोख जवानी
नदी का किनारा, वो झरने का पानी
न कुछ थी खबर, न होश कहीं था
बस वो थे वही थे कोई और नहीं था 
मगर जाने कहाँ से वो आंधी थी आई 
कुछ ग़लतफहमी झोंको ने सपने बिखेरे 
भरोसा था उनका वो टुटा वहीँ पर 
जिंदगी के शुरू फिर वो गहरे अँधेरे
आज फिर से उनकी जिंदगी में एक सूनापन है 
आज फिर उनकी तनहाइयों में वीरानापन है
वो बेबस हैं बैठे, और सोंचते ये रहते 
क्या ? प्यार था उनका
जो ग़लतफहमी से टूटा 
क्या ? भरोसा था उनका
ये बंधन जो छूटा
जाने अनजाने अपने ही मैं में
उन हसीं लम्हों को 
पनपने से पहले ही दफना दिया उन्होंने !!

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

एक सूरत है

जिंदगी मेरी लाख खूबसूरत ही सही
एक सूरत है
जो सबसे हट कर है
हर सूरत में
एक सच्चाई है
कुछ हकीकत है
एक फ़साना है
दूसरी तरफ ज़माना है
एक विश्वास है
कुछ सपने हैं
निरंकुश अभिलाषाएं हैं
आशाएं हैं
दो जिंदगी है
एक धुप है, एक बादल है
एक आंधी है, एक आँचल है 
एक गुंजन है, एक तन्हाई है
वो आलस है, ये अंगडाई है
एक दर्द है, एक मरहम है
एक दुसमन है, एक हमदम है
कुछ पल है, एक साथ हैं
कुछ दूर तक यही हालात हैं
बिखरते जज्बातों के साथ
जुदा अंदाज़ है
कुछ जरूरी है, कुछ जरूरत है
सबसे हट के एक सूरत है
हर सूरत में

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

वो तो हर एक बात पर ग़ज़ल लिखता है

वो  तो  हर  एक  बात  पर  ग़ज़ल  लिखता  है
नादाँ  है  जो    दरबे  को    महल   लिखता   है


लिखने को तो लिख दूंगा दास्तान-ऐ-मोहब्बत
मगर कौन है जो सच्चाई आज कल लिखता है


करता  अगर  वो  बातें  सागर  के   किनारे  की
कुँओं  की   ख़ामोशी  भी को हलचल लिखता है


होते  हैं  कुछ  दीवाने   दुनीयाँ मैं   इनके   जैसे
महबूब   को   वो   अपने  ताजमहल लिखता है


चुभ  जाते  हैं  पैरों  में  जब   कांटे  गुलिस्ताँ के
वो  दीवाना  है  कांटो  को  जो कमल लिखता है


वो वक़्त हुआ काफूर खुशियों का जब चलन था
अब  आंसूओं  के  किस्से  हर  पल  लिखता   है


सारे जहाँ  की  रौनक  बस्ती  थी  उसके  घर  में
वो   बटवारे   हुए   घर   को   जंगल   लिखता है

मित्र जो ढूंडन मैं चला

मित्र  जो  ढूंडन  मैं  चला  ढूँढा सकल जहाँन
फेसबुक किया सर्च तो मिल गए कल्लू राम
मिल गए  कल्लू राम स्क्रैप हमने कर डाला
यहाँ   छुपे  बैठे  हो  कर   के  तुम   घोटाला
लूटा   हमसे    जितने  रूपए  हमें   लौटाओ
नहीं    करोगे   ऐसा  कसम  हमारी   खाओ
इंटरपोल    पड़ी   पीछे    तो   होंगे   फड्डे
कपडे  लत्ते    संग   बिकेंगे    तुम्हारे चड्डे

बुधवार, 1 सितंबर 2010

मैं तेरी मोहब्बत का इलज़ाम लिए फिरता हूँ

मैं  तेरी  मोहब्बत  का  इलज़ाम  लिए  फिरता हूँ
जिस शहर से भी गुजरूँ तेरा नाम लिए फिरता हूँ


तेरा  जाना  मेरे  दिल   को  हर  लम्हा  रुलाता है
अश्क छुपाने की कोशिस नाकाम लिए फिरता हूँ  
            
दरबे  पर  मुझसे  मिलने  तेरा  नंगे  पाँव  आना 
अब तक एहसासों की मैं वो शाम लिए फिरता हूँ  


अच्छा है  भूल  जाऊं  किस्मत  मैं  जब नहीं तू
तुझको भूलने के खातिर मैं जाम लिए फिरता हूँ


जीना  भी  क्या है जीना बिन  तेरे भला मुझको 
मैं  अपने  न  होने  का  पैगाम  लिए  फिरता हूँ 
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