"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

ख़त को ख़त ही रहने दो

ख्वाबों को देखता हूँ
सीढियों से उतरते
गुज़रते
दबे पाँव
नज़रें चुराते
गलियारों से
और उधर
तुम्हारे तकिये कि नीचे
वो लम्हा
चुराकर रखा
है अब तक
और लिफाफे में
इश्क के
हज़ारों जगरातें 
जुगनू तितली बादल मंजर
छोड़ो ख्वाबों कि बातें
तुम कहो
जूही के पौधे पर
फूल आ गए होंगे अब तो
क्या कहा
कैसे जाना
तुम्हारे ख़त में
खुशबू आती है उसकी
और हाँ
अगर हो सके
ख़त को ख़त ही रहने दो
ई मेल मत बनाओ
बेजान सी लगती हैं
बातें  

रविवार, 26 सितंबर 2010

कुछ पल तो तुम्हारे साथ रहूँ

तुम कहती हो तो
कह देता हूँ
लोगों का क्या
वो तो कविता ही समझेंगे

जब से तुम
गई हो
गमलो में 
पौधे हँसना भूल गए हैं
बरामदे में
धूप कि किरने
आती तो हैं, मगर
रौशनी कहीं घुल गई है

परिंदे भी छत पर
कम हो गए
उन्हें भी तो आदत थी
तुम्हारे हाँथो के बाजरे की
शाम को अक्सर अब
जल्दी घर लौटता हूँ
और दरवाजे पर ठिठक जाता हूँ
शायद मेरे कदमो की
आह्ट सुनकर तुम फिर से दरवाजा खोलो  

हूँ न बेवकूफ
सब जानता हूँ
फिर भी सपने बुनता हूँ
सपने में आज
तुम्हे देखा
जान भूझ कर रूठ गया था तुमसे
तुम मनाती हो
तो अच्छा लगता है
आँखे खुल गई
तो जबरदस्ती आँखे मूँद ली
सपनो में ही सही
कुछ पल तो तुम्हारे साथ रहूँ

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

आओ मिलकर फुटबाल खेलें

आओ  मिलकर  फुटबाल  खेलें
जय  बम  भोले  जय बम भोले
भांग     धतुरा   पी    के  साधो
इधर  उधर   कि   टीम में होलें
हम  सब  करें  गोल   पर  गोल
जय  रघुनन्दन जय सिया बोल
पंडित   ढोंगी   राम  सुनो   जी 
तुम  बस बजाओ  ढोल पे ढोल
बांकी   सब   खेलें      फुटबाल 
नरक  स्वर्ग  सब  बाद में होगी
हम  भी  जोगी  तुम  भी जोगी
फुटबाल  खेलें  बन  कर  भोगी
खेल   खेलते   जोर   से   बोलें
आओ  मिलकर फुटबाल  खेलें
जय बम भोले  जय  बम भोले 

संता की परेशानी

संता कुछ परेशान सा घूम रहा था
अपने मन में जाने क्या सवाल बुन रहा था
पुरे घर में भटक रहा था
एक सवाल जो उसकी खोपड़ी में अटक रहा था
कि सारे चुटकुले संता पर ही क्यों बनते हैं
अरे दुनीयाँ में और भी तो लोग हैं
क्या हमी सिर्फ चुटकुले के योग्य हैं
हर चुटकुले हर बात में हमें ही घुसेड दिया जाता है
किसी की बेईजती करनी हो तो हमें ही भेड़ दिया जाता है
तभी संता की पत्नी मटकते हुए आई
मुस्कुराई फिर जोर से चिल्लाई
मैं तो तुमसे भर पाई
सुबह से एक भी काम नहीं किया
तुमने मुझे कौन सा सुख दिया 
महीने हो गए मायके गए
कम से कम मायके ही घुमा लाते
मुन्ने ने बिस्तर पर पोट्टी की
पोट्टी वहीँ छोड़ दी
कम से कम मुन्ने को ही धुला लाते
पडोसी से सीखो
हर महीने अपनी बीवी को नए जेवर दिलाता है
देर रात तक बीवी के पैर दवाता है
सुबह से देख रही हूँ इधर से उधर मचल रहे हो
आखिर ऐसी कौन सी ग़ज़ल लिख रहे हो
संता बोला अरी बंतो मैं अपने ही सवाल से परेशान हूँ
तू अपना ही राग गा रही है
मदत करती हो तो बता वरना क्यों मेरा दिमाग खा रही है
हर बात हर चुटकुले में मैं दाखिल हूँ कहीं न कहीं
कोई ऐसी बात बता जिसमे मैं शामिल नहीं
बंतो बोली अजी वैसे तो हार बात आपसे होकर गुजरने वाली है
मगर एक बात जिसमे आप शामिल नहीं हो वो ये है जो बताने वाली है
हौसला रखना मैं बिलकुल सच कहने वाली हूँ
में एक और बच्चे की माँ बनने वाली हूँ

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

ओस

हवाओं से टकराती
पत्तो पर लिपटती
फिसल कर मिट जाती है
जो कोई
स्पर्श करे
नर्म हाथों से
तो खुद में ही सिमट जाती है
तो कभी
खेतो में
धान कि बालियों पर
अटखेलियाँ करती
मंद हवाओं से
झूलती
घूंघट में पड़ी
दुल्हन सी खामोश
तो कभी
किसी महबूब के हांथो पर
माशूक की
चहल कदमी का
एहसास दिलाती हुई मदहोश
रूप का सागर
समेटे
आने वाली सुबह का
इंतज़ार करती है
कभी धूप में
कभी छाओं में
कभी बहारों की
फिजाओं में
आने वाले मुसाफिर की
राह तकती है
ओस
हाँ वही ओस
जो केवल अपने लिए नहीं
बल्कि औरों की
ख़ुशी के लिए मिटती
और फिर अगली सुबह
जीवित होती है 

बुधवार, 22 सितंबर 2010

बिजली कहाँ से आती है ?


स्कूल में मास्टर जी बच्चो का ज्ञान बढ़ा रहे थे
साईंस के टीचर थे सो विज्ञान पढ़ा रहे थे
ब्लैक बोर्ड पर सवाल लिखा, कि बिजली कहाँ से आती है ?
फिर अपनी पैनी निगाहों को चारो ओर घुमाया 
और सोंच विचार कर रामू को खड़ा करवाया 
बोले रामू तुम्हारी अकल्बंदी मुझे सबसे ज्यादा सताती है
तुम ही बताओ आखिर बिजली कहाँ से आती है ?
रामू खड़ा हो गया डर से 
बोला मास्टर जी मामा के घर से
मास्टर जी बोले वो कैसे 
रामू ने जवाब समझाते हुए मास्टर जी को फिर से मात दी 
बोला बिजली जाती है तो पापा कहते हैं कि सालों ने फिर से काट दी ! 

कॉमनवेल्थ नहीं कम ऑन वेल्थ

कॉमनवेल्थ नहीं कम ऑन वेल्थ

कॉमनवेल्थ खेल के नाम पर जिसे मौका मिल रहा है अपनी जेब भरने में लगा है ! फ्लाईओवर, ब्रिज, जल्दबाजी में धड़ल्ले से बनाये जा रहे है, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि इन सस्ते काम का खामियाजा आम जानता को भरना पड़ता है ! नेहरु स्टेडियम का ब्रिज अभी बनके तैयार भी नहीं हुआ कि उससे पहले टूट कर गिर गया और हमारे नेता है कि कह रहे हैं कि ये छोटे मोटे हादसे होते रहते हैं ! ये कैसा कॉमनवेल्थ गेम है ! ये तो कॉमनवेल्थ कम और कम ऑन वेल्थ (come on wealth)जयादा लग रहा है !!
 
कॉमन  वेल्थ   के  नाम पर, देश  को  रहे लूट
नेता  जी  घपला   करें ,  पहन   कर  सूट  बूट
पहन  कर  सूट बूट  करोडो  का  चुना लगाया 
खाए  रूपए  करोड़,  हज़ार का  पुल बनवाया
लूट  खसोट  कर  जानता  से  है खूब कमाया
फ्लाईओवर  का  ठेका  साले   को  दिलवाया  
कॉमनवेल्थ  का  मतलब  नेता  जी समझाएँ  
कम ऑन वेल्थ है मतलब, खूब रूपईये खाएँ

रविवार, 19 सितंबर 2010

एक शाम उधार दे दो


एक शाम उधार दे दो 
कुछ पल
ख़ुशी के तो जी सकूं,
इस जहाँ में
मेरा भी कुछ अस्तित्व हो
इसके लिए मुझे
एक नाम चाहिए
तुम मुझे वो नाम उधार दे दो


अपने ही गर्दिश के
सितारों में उलझा
सोया सा
मुकद्दर मेरा
माहुर कि घूँट
जलाती जिस्म
ये सब भूलना चाहता हूँ
इसके लिए मुझे
एक जाम चाहिए
तुम मुझे वो जाम उधार दे दो


भूख का
वो हँसता हुआ चेहरा
दर्द कि
वो फटी हुई चादर
हलक से निकलती
वो चीख
ये सब मिटाना चाहता हूँ

जानता हूँ
ये काम मुश्किल है बहुत 

फिर भी
तुम मुझे वो काम उधार दे दो
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