"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

ख्वाबों में चले आओ




मुनासिब हो तो ख्वाबों में चले आओ तुम पल भर को
तुम्हे देखे बिना  गुजरेगा क्या ये भी  साल, लगता  है

तुम्हारा ज़िक्र  तुम्हारी  बात जब आती है महफ़िल में
आईने  पर  उदासी  देखना  भी क्यों  कमाल  लगता है

तुम्हारे अक्स  से करता  हूँ बातें  तन्हा स्याह रातों  में
तुम्हारे अक्स से बेहतर क्यों तुम्हारा ख़याल लगता है

चांदनी रात कट जाती  है  यूँ तो,  अक्सर  जागते तन्हा
अश्क से भीगा हुआ तकिया मुझे क्यों रुमाल लगता है

कोई जब पूछता, कैसे जीते हो "संतोष" उसके बिन तन्हा
हँसी   में  टाल देता हूँ  मुश्किल  बहुत ये सवाल लगता है

31 टिप्‍पणियां:

  1. तुम्हारा ज़िक्र तुम्हारी बात जब आती है महफ़िल में
    आईने पर उदासी देखना भी क्यों कमाल लगता है
    Bahut khoob! Mere dono blogs pe aap aaye...tahe dil se shukriya!

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  2. मुनासिब हो तो ख्वाबों में चले आओ तुम पल भर को
    तुम्हे देखे बिना गुजरेगा क्या ये भी साल, लगता है..कोमल भावो की बेहतरीन अभिवयक्ति.....

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. कोई जब पूछता, कैसे जीते हो "संतोष" उसके बिन तन्हा
    हसी में टाल देता हूँ मुश्किल बहुत ये सवाल लगता है

    बहुत उम्दा रचना ....

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  5. तुम्हारे अक्श से करता हूँ बातें तन्हा स्याह रातों में
    तुम्हारे अक्श से बेहतर क्यों तुम्हारा ख़याल लगता है
    kya kahne....

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  6. तुम्हारा ज़िक्र तुम्हारी बात जब आती है महफ़िल में
    आईने पर उदासी देखना भी क्यों कमाल लगता है

    बहुत खूब ... अच्छी गज़ल

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  7. बहुत बढ़िया संतोष जी...हर शेर लाजवाब..

    कुछ टाइपिंग की गलतियाँ है उन्हें सुधार लीजिए..
    अक्श की जगह अक्स
    और हसी को हँसी कर दीजिए....hope u don't mind :-)

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  8. विद्या जी बहुत बहुत शुक्रिया !
    गलतियाँ सुधार ली हैं धन्यवाद !

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  9. कोई जब पूछता, कैसे जीते हो "संतोष" उसके बिन तन्हा
    हँसी में टाल देता हूँ मुश्किल बहुत ये सवाल लगता है

    बहुत खूब ............ खूबसूरत ग़ज़ल|

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  10. बहुत सुन्दर....
    शुभकामनाएं....

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  11. गहन दर्द भरे एहसास ...मर्म को छू गयी ये रचना ...

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  12. आप तो बहुत प्यारा लिखती हैं..बधाई. 'पाखी की दुनिया' में भी आपका स्वागत है.

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  13. बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल वाह वाह

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  14. मर्म को छूती सुन्दर रचना.. बहुत बढ़िया संतोष जी.

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  15. मर्मस्पर्शी रचना और सुन्दर प्रस्तुति |
    बधाई |
    आशा

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  16. 'कैसे जीते हो संतोष'? प्रेम की पराकाष्ठा।

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  17. चांदनी रात कट जाती है यूँ तो, अक्सर जागते तन्हा
    अश्क से भीगा हुआ तकिया मुझे क्यों रुमाल लगता है

    क्या बात हैं ..बहुत खूब ...

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  18. क्या बात हैं .. सुन्दर रचना जी

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  19. "कोई जब पूछता, कैसे जीते हो "संतोष" उसके बिन तन्हा
    हँसी में टाल देता हूँ मुश्किल बहुत ये सवाल लगता है"

    वाकई में बहुत मुश्किल सवाल है.....

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  20. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! दिल को छू गई हर एक पंक्तियाँ! लाजवाब प्रस्तुती!

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  21. तुम्हारा ज़िक्र तुम्हारी बात जब आती है महफ़िल में
    आईने पर उदासी देखना भी क्यों कमाल लगता है
    वाह ...बहुत खूब कहा है आपने ...बधाई के साथ शुभकामनाएं ।

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  22. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  23. सुन्दर भाव लिए रचना |
    आशा

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  24. मन को छू गई आपकी ये रचना.. बहुत बहुत शुभकामनाएं

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  25. कोई जब पूछता, कैसे जीते हो "संतोष" उसके बिन तन्हा
    हँसी में टाल देता हूँ मुश्किल बहुत ये सवाल लगता है

    कमाल की पंक्तियाँ लिखी हैं आपने, मन को छू गयीं...आभार!

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  26. क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनायें !
    मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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