"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

ज़िंदगी

ज़िंदगी को हादसे की तरह देखा
कभी छुआ कभी फेंका
कल्पनाओं की लड़ियाँ सजाता रहा
खुद से दूर जाती चीज़ को बुलाता रहा
दूर तक देर तक
अनजाने चेहरे से अपना सवाल दोहराता रहा
सब घूरते थे गुज़र जाते थे
मेरे सपने जो अनमोल थे मेरे लिए
गिरते थे टूट कर बिखर जाते थे

11 टिप्‍पणियां:

  1. ज़िंदगी को हादसे की तरह देखा
    कभी छुआ कभी फेंका
    कल्पनाओं की लड़ियाँ सजाता रहा
    खुद से दूर जाती चीज़ को बुलाता रहा
    Wah! Kya anoothe khayalaat hain!

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  2. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 02-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  3. आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया

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  4. aaj aur kal her ek pal...

    vatvriksh ke liye yah rachna bhejen rasprabha@gmail.com per parichay aur tasweer ke saath

    उत्तर देंहटाएं
  5. खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सपनो को तो संभालना होगा
    सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं

आपकी प्रतिक्रिया बहुमूल्य है !

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