"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

ख्वाबों में चले आओ




मुनासिब हो तो ख्वाबों में चले आओ तुम पल भर को
तुम्हे देखे बिना  गुजरेगा क्या ये भी  साल, लगता  है

तुम्हारा ज़िक्र  तुम्हारी  बात जब आती है महफ़िल में
आईने  पर  उदासी  देखना  भी क्यों  कमाल  लगता है

तुम्हारे अक्स  से करता  हूँ बातें  तन्हा स्याह रातों  में
तुम्हारे अक्स से बेहतर क्यों तुम्हारा ख़याल लगता है

चांदनी रात कट जाती  है  यूँ तो,  अक्सर  जागते तन्हा
अश्क से भीगा हुआ तकिया मुझे क्यों रुमाल लगता है

कोई जब पूछता, कैसे जीते हो "संतोष" उसके बिन तन्हा
हँसी   में  टाल देता हूँ  मुश्किल  बहुत ये सवाल लगता है

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

तुम्हे भी याद सताती होगी

तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी
अम्बिया की डाली पर बैठी
जब भी कोयल गाती होगी
सांझ ढले जब चाँद फलक पे
चुपके से आ जाता होगा
घर, आँगन तुलसी के आगे
तुम जब दीप जलाती होगी

तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी

जब मंदिर में फूल चढाने
नंगे पावं बढाती होगी
जब ऊँची घंटी तक तेरे
हाँथ नहीं पहुचते होंगे
पंडित से लगवाने टीका
जब तू सर को झुकाती होगी
अपने संग मुझे न पाकर
आँख तेरी भर जाती होगी
   
तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी

हाँथ पे मेहँदी से जब सखियाँ
नाम मेरा लिख जाती होंगी 
तेरा दुपट्टा जब भी सर से
काँधे पर ढल जाता होगा
और आंटे से सने हाँथ से
रोटी जब तू बनाती होगी
आँचल को सर पर रखने को
जब आवाज़ लगाती होगी

तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी

जब माथे पर ले कर मटका
पनघट से तुम आती होगी
जब भी सावन आता होगा
झूले जब भी पड़ते होंगे
संग सखियों के बैठ हिंडोले
जब तुम पींग बढाती होगी
दूर कहीं बंसी की धुन फिर
मेरी याद दिलाती होगी

तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी

बारिश के मौसम में जब
बादल से बूंद बरसती होगी
आँगन, गलियां, खेत, गाँव जब
पानी से भर जाते होंगे
और जाड़े की कड़क ठण्ड में
सर्दी जब बढ़ जाती होगी
बैठ अंगीठी के आगे तुम
जब जब आग सुलगाती होगी


तुम्हे भी याद सताती होगी
पुरवईया जब आती होगी
अम्बिया की डाली पर बैठी
जब भी कोयल गाती होगी

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

खुश्क पत्तों का मुकद्दर ले कर





खुश्क    पत्तों    का    मुकद्दर    ले     कर
आग  के  शहर में रहता हूँ ऐक घर ले कर

खौफ़ मुझको न कभी तेज़ हवाओं का रहा
मैं बिखरा हूँ तेरे इश्क का हर असर ले कर

लोग बारिश से संभलने का हुनर पुछते रहे
मैं   लौटा  हूँ  आँखो  में  समनदर  ले  कर

खुश्क    पत्तों    का    मुकद्दर     ले    कर
आग  के  शहर में रहता हूँ ऐक घर ले कर

सोमवार, 28 नवंबर 2011

अनदेखे ख्वाब

तुम्हारे साथ के
कुछ भीगे सावन
अब भी गीले पड़े हैं
उम्र गुजर रही है
मगर होंठ
अब भी सिले पड़े हैं
कुछ चाहतों के दबे ख़त
कुछ ख्वाहिशों की अधूरी
ग़ज़ल
रात के दुसरे पहर में
अनदेखे ख्वाब
सिसक उठते हैं
और आँगन के
गमले में
पोधों के पत्ते
अब तक पीले पड़ें हैं

तुम्हारा नाम
नीली स्याही से
मेरी हथेलियों में
अब भी मिटा मिटा सा है
मुझे नहीं पता
मेरी किस्मत में तुम
कितनी हांसिल हो
चलो दूर सही
तुम मेरी हिचकियों में
अब भी शामिल हो !!

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

बहुत तन्हाईयाँ हैं मेरे हिस्से में...



बहुत तन्हाईयाँ हैं मेरे हिस्से में चुरा लो तुम
तुम्हारा साथ मेरी तनहाइयों से कुछ तो बेहतर है

ज़िन्दगी कब तलक देगी मुझे उपहार में धोका
चलो धोका सही पर ज़िन्दगी से कुछ तो बेहतर है

कभी बारिश कभी झूले कभी शबनम का मौसम था
चलो सब नम गए लेकिन किसी के गम से बेहतर है

है आदत हमको पीने की चलो मन मगर समझो
ये आदत यूँ ही रहने दो ये आदत हम से बेहतर है

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

बन जाओ हमसफ़र

"बन जाओ हमसफ़र कि रहगुज़र का वासता,
कट जाऐ ये सफ़र ये तन्हा तन्हा रासता,
मिल गऐ हो तुम तो मुझे मेरे करम से,
वर्ना कहां मैं ज़िन्दगी तुझको तलाशता..!!"

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

दिल भी सूना सूना है

दुनियाँ  है  अंजानी  सी  और रास्ता  भी  अंजाना सा
तुम होते जो पास तो लगता कुछ जाना पहचाना सा

दूर  गए  हो  तुम  तो  जब  से  दिल भी सूना सूना है
आँगन  सूना  घर  भी   सूना  जैसे  एक  वीराना  सा

दिल की बातें दिल ही जाने मुझको इतना  मालूम है
तेरी  गलियों  में  फिरता  है  जैसे  एक   दीवाना  सा

जैसा  हूँ  में खुश  रहता हूँ  सबसे जब में ये कहता हूँ
सब  कहते  हैं  मुझको  लगता  ये तो एक बहाना सा

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

दिल में अभी दर्द का तूफ़ान बाकी है

दिल  में  अभी  दर्द  का  तूफ़ान  बाकी  है
इस  इश्क का होना अभी अंजाम बाकी है

आँधियों  में  बह  गऐ  हैं  तिनके - तिनके
खुद के बिखरने का बस अरमान बाकी  है

जिस  घर  को  सजाया  था हांथो  से  अपने
उस घर  का  बिखरा  हुआ सामान बाकी है

माना की ज़ख्म भर  गया  जो तूने दिया था
लेकिन अभी उस ज़ख्म का निशान बाकी है

दुनियाँ  मे  हर  शय  से  पाया है सिर्फ धोका
अब आज़माने को बस ऐक भगवान बाकी है
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