तुम्हे देखे बिना गुजरेगा क्या ये भी साल, लगता है
तुम्हारा ज़िक्र तुम्हारी बात जब आती है महफ़िल में
आईने पर उदासी देखना भी क्यों कमाल लगता है
तुम्हारे अक्स से करता हूँ बातें तन्हा स्याह रातों में
तुम्हारे अक्स से बेहतर क्यों तुम्हारा ख़याल लगता है
चांदनी रात कट जाती है यूँ तो, अक्सर जागते तन्हा
अश्क से भीगा हुआ तकिया मुझे क्यों रुमाल लगता है
कोई जब पूछता, कैसे जीते हो "संतोष" उसके बिन तन्हा
हँसी में टाल देता हूँ मुश्किल बहुत ये सवाल लगता है





