"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष

सोमवार, 30 अगस्त 2010

कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी विकट होती है

कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी विकट होती है
मंडराते  खर्चे  के  बादल  जब भी कभी निकट होती है
सुबह     सवेरे     फ़ोन    करेंगे
फ़ोन तो क्या मिस कॉल करेंगे
कर भी  लिया फ़ोन चलो माना
अंत  में  बिल तो  हम ही भरेंगे
आठ घंटे कॉल के बाद भी फ़ोन नहीं डीस्कनेस्ट होती है
कितनी  भी  हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
शोपिंग तो  सिर्फ  माल  में होगी
लंच   डिनर हर  हाल  में  होगी
उतर गया जब भूत डाइटिंग का
डेट फिर माक डोनाल्ड में होगी
पिक्चर का खर्चा भी महंगा पाँच सौ की टिकट होती है
कितनी भी हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
दस लिपिस्टिक बारह सेंडिल
रोज़  रोज़  नए  नए स्कैंडल
फरमाइश अभी पूरी भी नहीं
तभी टूट गया पर्स का हेंडल
कितने भी कंजूस बनो तूम खर्चे की ये एक्सपर्ट होती हैं
कितनी  भी  हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
झूठे प्यार का हैं ये नमूना
लेकिन प्रेमिका बिन जगसुना
प्यार बढे जब हद से समझो
लगने  वाला  है  तब   चूना
छोटी  छोटी  बातों  पर  भी  सारा  दिन खटपट होती है
कितनी  भी  हो प्रिय प्रेमिका लेकिन बड़ी वीकट होती है
जासूसी   करें   नए   नए  वो
मेसेज बॉक्स भी चेक करे वो
टोक- टोक के  आदत  बदली
खुद ही कहें फिर बदल गए हो
बहस करो इस बात पर जब तुम झूट मूठ की हर्ट होती है
कितनी  भी  हो प्रिय  प्रेमिका  लेकिन बड़ी वीकट होती है

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या बात कही है आपने इन पंक्तियों के द्वारा .... अच्छी रचना .....

    कुछ लिखा है, शायद आपको पसंद आये --
    (क्या आप को पता है की आपका अगला जन्म कहा होगा ?)
    http://oshotheone.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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