"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

मील का पत्थर

मैं
एक मील का पत्थर
हर लम्हा
किसी मुसाफिर के आने का इंतज़ार है
हर मुसाफिर
जिसके चेहरे पर
जिंदगी के धूप का
पसीना है
माथे पर शिकन है


पल भर
आशा की
कटु नज़रों से
देखता मेरी तरफ
उसे उसकी मंजिल की दूरी का
एहसास
दुखी करता है


पर मैं क्या करूं
मैं
अनजाने चाह की तहतो में लिपटा
एक बेबस पत्थर
जो उसे उसकी मंजिल की

दूरी की झलक दिखाता हूँ
घूरते हैं मुझे
और निकल जाते हैं  

7 टिप्‍पणियां:

  1. संतोष जी बहुत अच्छी कविता है ! मील के पत्थर भी इतना सोंचते होंगे पता नहीं था ! काबिले तारीफ !

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  2. बहुत ही सुंदर कविता है संतोष जी ! अचानक ही ब्लॉग सर्च कर रही तो आपके ब्लॉग पर नज़र पड़ गई, आपने यहाँ हिंदी में लिखने का टूल लगाया हुआ है इसलिए हिंदी में कमेन्ट कर रही हूँ !

    उत्तर देंहटाएं
  3. आप की रचना 17 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com


    आभार

    अनामिका

    उत्तर देंहटाएं
  4. मील का पत्थर...बनना बहुत कठिन है| बहुत सुन्दर कविता|
    कई जगह मात्राओं के दोष है उन्हें ठीक कर लें
    बहुत बहुत शुभकामनाएं|
    ब्रह्माण्ड

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  5. बहुत गहरी सोच को व्यक्त किया है।

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  6. आप सबका अभिनन्दन है मेरे ब्लॉग पर !
    @ राणा प्रताप जी बहुत शुक्रिया मात्राओं के दोष की ओर ध्यान दिलवाने के लिए! मात्राओं को लेकर बचपन में बहुत डांट पड़ती थी ! मैंने अपनी तरफ से उन्हें ठीक कर लिया है, फिर भी मेरी नज़र से कोई चूक रह गई हो तो जरूर बताइयेगा !

    उत्तर देंहटाएं
  7. क्या बात है...बहुत बढ़िया रचना.

    उत्तर देंहटाएं

आपकी प्रतिक्रिया बहुमूल्य है !

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