"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष

रविवार, 19 सितंबर 2010

एक शाम उधार दे दो


एक शाम उधार दे दो 
कुछ पल
ख़ुशी के तो जी सकूं,
इस जहाँ में
मेरा भी कुछ अस्तित्व हो
इसके लिए मुझे
एक नाम चाहिए
तुम मुझे वो नाम उधार दे दो


अपने ही गर्दिश के
सितारों में उलझा
सोया सा
मुकद्दर मेरा
माहुर कि घूँट
जलाती जिस्म
ये सब भूलना चाहता हूँ
इसके लिए मुझे
एक जाम चाहिए
तुम मुझे वो जाम उधार दे दो


भूख का
वो हँसता हुआ चेहरा
दर्द कि
वो फटी हुई चादर
हलक से निकलती
वो चीख
ये सब मिटाना चाहता हूँ

जानता हूँ
ये काम मुश्किल है बहुत 

फिर भी
तुम मुझे वो काम उधार दे दो

4 टिप्‍पणियां:

  1. मन के भावों को शब्द दिए हैं .. अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छे शब्द दिए हैं इन भावो को..

    एक बात याद आई आपकी रचना पढ़ कर..

    बिन मांगे मोती मिलें ...मांगे मिले ना भीख.

    उत्तर देंहटाएं
  3. दिल मे उतर गयी आपकी रचना।
    आपकी पोस्ट आज के चर्चामंच का आकर्षण बनी है । चर्चामंच पर आकर अपने विचारों से अवगत करायें।
    http://charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. संतोष जी बहुत ही अच्छी कविता लगी !

    उत्तर देंहटाएं

आपकी प्रतिक्रिया बहुमूल्य है !

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