"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

वो तो हर एक बात पर ग़ज़ल लिखता है

वो  तो  हर  एक  बात  पर  ग़ज़ल  लिखता  है
नादाँ  है  जो    दरबे  को    महल   लिखता   है


लिखने को तो लिख दूंगा दास्तान-ऐ-मोहब्बत
मगर कौन है जो सच्चाई आज कल लिखता है


करता  अगर  वो  बातें  सागर  के   किनारे  की
कुँओं  की   ख़ामोशी  भी को हलचल लिखता है


होते  हैं  कुछ  दीवाने   दुनीयाँ मैं   इनके   जैसे
महबूब   को   वो   अपने  ताजमहल लिखता है


चुभ  जाते  हैं  पैरों  में  जब   कांटे  गुलिस्ताँ के
वो  दीवाना  है  कांटो  को  जो कमल लिखता है


वो वक़्त हुआ काफूर खुशियों का जब चलन था
अब  आंसूओं  के  किस्से  हर  पल  लिखता   है


सारे जहाँ  की  रौनक  बस्ती  थी  उसके  घर  में
वो   बटवारे   हुए   घर   को   जंगल   लिखता है

2 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय बंधु संतोष कुमार जी

    बढ़िया भाव हैं , और भी श्रेष्ठ लिखने की पूरी संभावनाएं हैं …
    शुभकामनाएं …
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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