"मचान" ख्वाबो और खयालों का ठौर ठिकाना..................© सर्वाधिकार सुरक्षित 2010-2013....कुमार संतोष

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

ओस

हवाओं से टकराती
पत्तो पर लिपटती
फिसल कर मिट जाती है
जो कोई
स्पर्श करे
नर्म हाथों से
तो खुद में ही सिमट जाती है
तो कभी
खेतो में
धान कि बालियों पर
अटखेलियाँ करती
मंद हवाओं से
झूलती
घूंघट में पड़ी
दुल्हन सी खामोश
तो कभी
किसी महबूब के हांथो पर
माशूक की
चहल कदमी का
एहसास दिलाती हुई मदहोश
रूप का सागर
समेटे
आने वाली सुबह का
इंतज़ार करती है
कभी धूप में
कभी छाओं में
कभी बहारों की
फिजाओं में
आने वाले मुसाफिर की
राह तकती है
ओस
हाँ वही ओस
जो केवल अपने लिए नहीं
बल्कि औरों की
ख़ुशी के लिए मिटती
और फिर अगली सुबह
जीवित होती है 

3 टिप्‍पणियां:

  1. हाँ वही ओस
    जो केवल अपने लिए नहीं
    बल्कि औरों की
    ख़ुशी के लिए मिटती
    और फिर अगली सुबह
    जीवित होती है
    बहुत सुंदर कविता...बिल्कुल ओस की तरह
    http://veenakesur.blogspot.com/
    यहां भी जरूर आएं और मेरी या किसी की भी रचनाएं पसंद आएं तो अपनी बहुमूल्य राय दें और फॉलो अवश्य करें...

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  2. वीणा जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका जो आपने अपना समय मेरे ब्लॉग के लिए निकला, आपकी हर रचना मैं पढता हूँ !

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